मोदी राज में कम नहीं हुआ भ्रष्टाचार

बाल मुकुन्द ओझा

भारत में भ्रष्टाचार ने लगता है संस्थागत रूप धारण कर लिया है। देश और विदेश की अनेक जानी मानी संस्थाओं ने समय समय पर जारी अपनी रिपोर्टों में यह जाहिर किया है की लाख प्रयासों के बाद भी भारत में भ्रष्टाचार कम होने के बजाय बढ़ा है। भारत के प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी ने खुलेआम यह कहा है की वे न तो खाएंगे और न खाने देंगे। मोदी अपनी बात पर कायम रहे मगर भ्रष्टाचार पर काबू नहीं पाया जा सका है। मोदी शासन के दौरान भी अनेक बड़े घोटालों का पर्दाफास हुआ है। विपक्ष का आरोप है कि सरकार के संज्ञान में आने के बाद भी इन पर कोई प्रभावी कार्यवाही नहीं हुई और घोटालेबाज देश छोड़कर भागने में सफल हुए।
भारत भ्रष्टाचार के मामले में हर साल नई सीढ़ियां चढ़ रहा है। दुनिया के भ्रष्टाचार पर नजर रखने वाली संस्था ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल के मुताबिक भ्रष्टाचार में भारत का स्थान हर साल बढ़ता जा रहा है। साल 2020 के भ्रष्टाचार धारणा सूचकांक में दुनिया के 180 देशों में भारत का स्थान छह पायदान फिसलकर 86वें नंबर पर आ गया। वर्ष 2020 के लिए ‘ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल का भ्रष्टाचार धारणा सूचकांक गुरुवार को जारी किया गया। सूचकांक में 180 देशों में सार्वजनिक क्षेत्र में भ्रष्टाचार के स्तर का रैंक जारी किया जाता है, जिसमें शून्य से लेकर 100 तक के पैमाने का उपयोग किया जाता है, जहां शून्य स्कोर वाले देश को सबसे अधिक भ्रष्ट माना जाता है और 100 स्कोर वाले को सबसे साफ माना जाता है। भारत 40 अंकों के साथ 180 देशों में 86वें स्थान पर है। सूचकांक में कहा गया है कि 2019 में भारत 180 देशों में 80वें स्थान पर था। इस वर्ष भारत का स्कोर पिछले वर्ष के स्कोर के बराबर है। रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत अब भी भ्रष्टाचार सूचकांक में काफी पीछे है। हालांकि विशेषज्ञों का मानना है कि सीपीआई किसी भी देश में भ्रष्टाचार के वास्तविक स्तर को नहीं दर्शाता है। एशियाई देशों में 78वां रैंक लाने वाले चीन की स्थिति भारत से थोड़ी ठीक है. वहीं, पाकिस्तान 124वें और नेपाल 117वें स्थान पर है। ट्रांसपेरेंसी ने जिन 180 देशों का सर्वेक्षण किया, उनमें से दो तिहाई देशों ने 100 में से 50 से कम अंक हासिल किए और औसतन अंक 43 रहा। इस हिसाब से देखा जाए तो भारत की स्थिति पाकिस्तान, नेपाल और बांग्लादेश के मुकाबले बहुत ठीक है, लेकिन पिछले दो साल में इसकी रैंकिंग भी गिरी है। एक रिपोर्ट के मुताबिक, 2018 की रिपोर्ट में भारत 81वें स्थान पर था। 2019 की रिपोर्ट में 78वें पायदान पर था। 2020 की रिपोर्ट में 80वें पायदान पर पहुंचा और अब 2021 की रिपोर्ट में 86वें पायदान पर पहुंच गया है.
ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल ने सुझाव दिया है कि भ्रष्टाचार से मुकाबला करने के लिए चार प्रमुख बिंदुओं पर ध्यान देना होगा, ताकि भ्रष्टाचार का स्वास्थ्य व्यवस्था पर नकारात्मक प्रभाव न पड़े। पारदर्शिता के साथ निरीक्षण संस्थानों को मजबूत किया जाना चाहिए। साथ ही पारदर्शी करार सुनिश्चित किया जाना चाहिए और सूचना तक पहुंच की गारंटी भी देनी चाहिए।
135 करोड़ की आबादी का आधा भारत आज रिश्वतखोरी के मकड़जाल में फंसा हुआ है। भ्रष्टाचार पर सर्वे की विभिन्न रिपोर्टों से यह खुलासा हुआ है। भारत में भ्रष्टाचार ने संस्थागत रूप ले लिया है। स्थिति यह हो गई है की बिना रिश्वत दिए आप एक कदम भी आगे नहीं बढ़ सकते।
हमारे देश में भ्रष्टाचार इस हद तक फैल चुका है कि इसने समाज की बुनियाद को ही बुरी तरह हिला कर रख दिया है। जब तक मुट्ठी गर्म न की जाए तब तक कोई काम ही नहीं होता। भ्रष्टाचार एक संचारी बीमारी की भांति इतनी तेजी से फैल रहा है कि लोगों को अपना भविष्य अंधकार से भरा नजर आने लगा है और कहीं कोई भ्रष्टाचार मुक्त समाज की उम्मीद नजर नहीं आरही है। मंत्री से लेकर संतरी और नेताओं तक पर भ्रस्टाचार के दलदल में फंसे है। हालात इतने बदतर हैं कि निजी क्षेत्र भी इससे अछूता नहीं है। सिविल सोसाइटी और मीडिया के दवाब में सरकारी एजेंसियां भ्रष्टाचार के खिलाफ कार्रवाई को अंजाम तो दे रही हैं मगर उनकी गति बेहद धीमी है ।

(लेखक वरिष्ठ स्तम्भकार एवं पत्रकार हैं)

 

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