इसे किसान नहीं,हिंसक सियासी आंदोलन की तरह ट्रीट किया जाए

अजय कुमार,लखनऊ

देश से ऊपर कोई नहीं हो सकता है। चाहें आम हो या फिर कोई खास शख्स। अगर कोई यह मुगालता पालता है कि देश उसके बिना चल-बढ़ नहीं सकता है या फिर कोई दहशतगर्दी के बल पर देश की अखंडता अथवा उसके सम्मान के साथ खिलवाड़ कर सकता है। 26 जनवरी जैसे पावन राष्ट्रीय पर्व पर जिस तरह से नया कृषि कानून वापस लेने की आड़ में मुट्ठी भर अराजक तत्वों ने देश को शर्मसार किया वह किसी माॅफी के काबिल नहीं है। इससे खतरनाक स्थिति यह है कि मोदी विरोधी खेमा अपनी ओछी राजनीति चमकाने के लिए देश की अस्मिता को चुनौती देने वाले किसानों की हठधर्मी को अनदेखा करके अपनी सियासी रोटियां सेंकने में लग गई हैं। यह वह नेता हैं जो अपने बल पर मोदी से मुकाबला नहीं कर पाते हैं इसलिए कभी यह एनआरसी की आड़ में मुसलमानों को भड़काते हैं तो कभी किसानों को उकसाते हैं। इसी तरह यह लोग मोदी को पटकनी देने के लिए एवार्ड वापसी गैंग का साथ देते हैं तो कभी उन लोगों के साथ खड़े हो जाते हैं जो यह कहते घूमते रहते हैं कि देश अब रहने लायक नहीं रह गया है। यहां रहने में डर लगता है। कुल मिलाकर जिन नेताओं को मोदी के विकल्प के रूप में जनता ने पूरी तरह से ठुकरा दिया है, वह अराजक तत्वों के साथ तक खड़े हो जाने से परहेज नहीं करते हैं,बल्कि उन्हें उकसाने का भी काम करते हैं। ताकि मोदी सरकार की राह में रोड़े खड़े किए जा सकें। यह सिलसिला मोदी के गुजरात का मुख्यमंत्री बनने के बाद शुरू हुआ था जो उनके प्रधानमंत्री बनने के बाद आज तक जारी है। मोदी विरोधी इन नेताओं पर न तो तिरंगे के अपमान का असर पड़ता है, न देश की अखंडता को चुनौती देने वालों से इन्हें किसी तरह का कोई गुरेज रहता है,क्योंकि इनका एजेंडा अपनी सियासत चमकाने तक ही सीमित रहता है। यह दुखद है कि एक तरफ किसान, आंदोलन के नाम पर जगह-जगह हाई-वे जाम करके बैठ गए है दूसरी तरह हाई-वे अवरूद्ध होने के चलते लोगों को आवागमन में परेशानी हो रही है। क्षेत्रीय लोगों का काम धंधा ठप हो गया है। लोग भुखमरी के कगार पर आ गए हैं,लेकिन इसकी किसी नेता को चिंता नहीं हैं।
लब्बोलुआब यह है कि गाजीपुर से लेकर सिंधु बार्डर तक चल रहा किसान आंदोलन पूरी तरह से सियासी आंदोलन बन गया है। सबकी नजर किसान वोट बैंक पर है कि कैसे इसे हासिल किया जा सके। गणतंत्र दिवस पर जब पूरी दुनिया की नजर हिन्दुस्तान की थी,तब देशद्रोही ताकतों ने जो कृृत्य किया उसकी कोई माफी नहीं हो सकती है। इन्हें किसान तो कतई नहीं कहा जा सकता है। कथित किसान आंदोलन का नेतृत्व करने वाले तमाम स्वयंभू नेताओं को उनके कृत्य के लिए कड़ी से कड़ी सजा मिलना चाहिए। एक तो अब केन्द्र सरकार इनसे किसी तरह की वार्ता न करे, दूसरे इन स्वयंभू किसान नेताओं का ऐसा इलाज करना चाहिए कि भविष्य में कोई और इस तरह की अराजकता करने की हिम्मत नहीं जुटा पाए ,इसके लिए किसान नेताओं का इलाज योगी ‘थैरेपी’ से ठीक वैसे ही किया जाना चाहिए जैसा नवंबर-दिसंबर 2019 में नागरिकता संशोधन कानून की मुखालफत के नाम पर प्रदेश को दंगे की आग में झोंकने की कोशिश करने वालों का, योगी सरकार द्वारा किया गया था।
दिल्ली में सरकारी या निजी सम्पति का जो नुकसान हुआ है, उसकी भरपाई इन्हीं स्वयंभू किसान नेताओं और अराजकता फैलाने वालों की निजी सम्पति की कुर्की करके की जानी चाहिए। इन उपद्रवियों के खिलाफ जो भी कार्रवाई हो,उसे फास्ट ट्रैक कोर्ट में चलाना चाहिए ताकि देश के स्वाभिमान से खिलवाड़ करने वालें यह भ्रम नहीं पाल पाएं कि उनका कुछ नहीं होगा। यह अच्छा है कि दिल्ली पुलिस ने दंगाइयों के खिलाफ एफआईआर लिख कर कुछ गिरफ्तारियां भी कर ली हैं,लेकिन दंगाइयों के बीच बड़ा मैसेज तभी जाएगा,जब किसान आंदोलन की आड़ में अपनी दुकान चला रहे कथित किसान नेताओं को जेल की सलाखों के पीछे नहीं भेजा जाएगा। अच्छा होगा कि दिल्ली पुलिस, राकेश टिकैत जैसे किसान नेताओं जिन्होंने दंगाइयों कोभड़काने में अहम भूमिका निभाई थी, की एफआईआर यूपी पुलिस को इस आश्य के साथ सौंप दे कि टिकैत यूपी के रहने वाले हैं और टिकैत ने यूपी की सीमा से ही किसानों को भड़काने और दंगा कराने की योजना को अंजाम दिया था। इसके बाद योेगी सरकार को टिकैत के खिलाफ क्या करना है,वह स्वयं तय कर लेंगे। यूपी की सड़के तो वैसे ही बहुत खराब हैं, यहां अक्सर ही अपराधियों की गाड़ियां पलट जाती हैं।
राष्ट्र को शर्मिंदा करने वाली अराजकता की भेंट चढ़े किसान आंदोलन के उन गैर-जिम्मेदार नेताओं पर केवल एफआइआर दर्ज होना ही पर्याप्त नहीं। उन्हें गिरफ्तार कर ऐसे जतन भी किए जाने चाहिए, जिससे उन्हें उनके अपराध की सजा मिले और फिर कोई समूह-संगठन वैसा दुस्साहस न कर सके, जैसा गणतंत्र दिवस पर देखने को मिला। किसानों की आड़ में नेतागीरी करने वालों को बेनकाब करना इसलिए आवश्यक है, क्योंकि उनमें से ज्यादातर का खेती-किसानी से कोई लेना-देना नहीं। वे या तो आदतन आंदोलनबाज हैं अथवा किसानों के नाम पर अपनी राजनीतिक दुकान चलाने वाले स्वार्थी तत्व। यह लोग देश में कहीं भी कोई आंदोलन शुरू होता है,उसमें कूद पड़ते हैं। वास्तव में इसी कारण किसान संगठनों की मोदी सरकार से लंबी बातचीत किसी नतीजे पर नहीं पहुंच पाई। यह बातचीत तब नाकाम हुई, जब सरकार लगातार नरमी का परिचय दे रही थी और सुप्रीम कोर्ट भी किसान आंदोलन का संज्ञान ले रहा था। अड़ियल, अहंकारी और संदिग्ध इरादों वाले स्वयंभू किसान नेताओं के कारण ही दिल्ली में डेरा डाले किसान आंदोलन में अराजक और सरकार विरोधी तत्वों ने घुसपैठ की। तथाकथित किसान नेताओं ने पहले तो इन तत्वों को संरक्षण दिया और जब गणतंत्र दिवस पर उन्होंने दिल्ली में भीषण उत्पात मचाया तो वे उनसे पल्ला झाड़कर बच निकलने की ताक में हैं,लेकिन इनके लिए यह इतना आसान नहीं होगा।

किसान नेताओं की मानें तो अराजक तत्वों का सरगना दीप सिद्धू लाल किले की शर्मनाक घटना के लिए जिम्मेदार है। सवाल है कि क्या केवल इसी लफंगे के साथियों ने दिल्ली में दर्जनों जगह उपद्रव किया? क्या आतंक का पर्याय बन गए उन तमाम ट्रैक्टरों पर दीप सिद्धू के ही दंगाई सवार थे, जो दिल्ली को जगह-जगह रौंद रहे थे? आखिर जब ऐसा हो रहा था, तब किसान नेताओं के कथित कार्यकर्ता क्या कर रहे थे? ऐसे सवालों से किसान नेता इसलिए नहीं बच सकते, क्योंकि वे अपने समर्थकों को इसके लिए खुद ही उकसा रहे थे कि दिल्ली पुलिस की ओर से तय शर्तों की परवाह न की जाए। यह भी जग जाहिर है कि वे इससे लगातार आंखें मूंदे रहे कि उनके आंदोलन में किस तरह खालिस्तानी तत्व सक्रिय होते जा रहे हैं? यदि इन नेताओं में थोड़ी भी शर्म होती तो वे तुरंत अपना आंदोलन खत्म करने की घोषणा करते, लेकिन ज्यादातर ऐसा करने से इन्कार कर रहे हैं। साफ है कि उन्हें अपने किए पर कोई पछतावा नहीं। वे इसके बावजूद हठधर्मी दिखा रहे हैं कि दो किसान संगठनों ने गणतंत्र दिवस पर हुई हिंसा से शर्मिंदा होकर खुद को इस आंदोलन से अलग कर लिया है। स्पष्ट है कि जो अभी भी आंदोलन जारी रखने पर आमादा हैं, वे न तो किसानों के नेता हैं और न उन्हें देश के मान-सम्मान की कहीं कोई परवाह है। आज सिुंध बार्डर पर जिस तरह का नजारा देखने को मिला वह काफी पीड़ादायक था। आंदोलनकारियों को न स्थानीय लोगों की परेशानी की चिंता है, न इस बात कि फिक्र की उनके चलते कितनी अव्यवस्था फैल रही है।

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