साठ दिन की शांति पर एक दिन का उपद्रव भारी

Bal Mukund Ojha

साठ दिन की शांति को एक दिन के तांडव ने पलीता लगा दिया। पूरा देश मंगलवार को गणतंत्र दिवस मनाने में जुटा था, उसी वक्त राजधानी दिल्ली में किसान प्रदर्शनकारियों का उत्पात जारी था। कृषि कानूनों के खिलाफ दिल्ली बॉर्डर पर पिछले दो महीने से डेरा डाले किसानों ने गणतंत्र दिवस पर शांतिपूर्ण ट्रैक्टर परेड का वादा किया था, लेकिन सारे वादे टूट गए। किसानों के नाम पर उपद्रवियों ने दिल्ली में घुसकर जमकर हंगामा किया। सुरक्षा के सारे इंतजाम धरे के धरे रह गए। कृषि कानून के खिलाफ जारी आंदोलन में किसान संगठनों ने ट्रैक्टर मार्च निकालने की बात कही, लेकिन मंगलवार को ये मार्च हिंसा में तब्दील हो गया। दिल्ली केअनेक इलाकों में पुलिस और प्रदर्शनकारियों में भिड़ंत हुई, कई लोग घायल हुए और दिल्ली में जगह-जगह तोड़फोड़ हुई। पुलिस ने भी कानून तोड़ने वाले लोगों पर डंडे चलाये। किसानों की ट्रैक्टर परेड के लिए पहले से ही रुट तय थे। पुलिस की 37 शर्तों पर किसान संगठनों ने हामी भरी थी, लेकिन गणतंत्र दिवस की शुरुआत होते ही तस्वीर बदल गई। ट्रैक्टर पर चढ़े उपद्रवी रास्ते की रुकावटों को तोड़ते हुए दिल्ली के केंद्र आईटीओ तक पहुंच गए।
देश की सरहद पर बैठे किसान नेताओं को राजधानी में हुए बेहिसाब उपद्रव का जिम्मेदार समझा जा रहा है। देशवासी मांग कर रहे है कानून को धता बता रहे कथित किसान नेताओं को कानून के शिकंजे में लाया जाये। किसान नेता अब तक सच्चाई को समझ नहीं रहे है। उनकी सफाई बेमानी है। दिल्ली पुलिस की हिंसा की आशंका सच निकली जिसे किसान नेता समय रहते भांप नहीं पाए। इस कथित ट्रैक्टर परेड में भिन्न भिन्न विचारधाराओं के किसान शामिल हुए। ट्रैक्टर मार्च में सियासी घुसपैठ से भी इंकार नहीं किया जा सकता है। वामपंथी संगठन अपने लाल झंडे के साथ शरीक हुए वहीँ कांग्रेसियों ने भी बढ़चढ़कर अपना समर्थन दिया। स्वराज इंडिया के योगेंद्र यादव ने अवश्य माफी मांगी और दिल्ली हिंसा की निंदा की जबकि अन्य नेता हाल फिलहाल झूठे तर्क गढ़ने में लगे है। किसानों द्वारा निकाली गई ट्रैक्टर परेड में सिर्फ ट्रैक्टर ही नही बल्कि तमाम तरह के यातायात के साधन शामिल किए गए थे। इनमें घोड़ों से लेकर साइकिल, बाइक, तीन पहिया ऑटो, तमाम तरह की कारें, बस, ट्रक और यहां तक कि जेसीबी जैसी भारी मशीनें भी शामिल थीं।
न्यूज चैनलों में किसानों ने साफ कहा वे लालकिले और इंडिया गेट जा रहे है। वे मोदी को ढूंढ रहे है। लाल किले में तिरंगे के स्थान पर धार्मिक झंडे को फहरा कर किसानों ने देश को क्या सन्देश दिया यह समझने की जरूरत है। दिल्ली में हुए उपद्रव की जिम्मेदारी लेने से किसान नेताओं ने साफतौर पर मना कर दिया। पुलिस ने दो दर्जन एफआईआर दर्ज कर अनुसन्धान शुरू कर दिया। इस उपद्रव में सौ से अधिक पुलिस वालों के घायल होने की जानकारी मिली है। पुलिस ने संयम से काम नहीं लिया होता तो दिल्ली लाशों से पट जाती। पुलिस के संयम की सर्वत्र सराहना की जा रही है। हालाँकि उपद्रवकारियों ने हिंसक गतिविविधियों में कोई कसर नहीं छोड़ी। ट्रैक्टर मार्च के दौरान सबसे अधिक बवाल दिल्ली के आईटीओ, डीडीयू मार्ग, लालकिले के आसपास वाले इलाके में हुआ था. यहां पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच भी भीषण संघर्ष हुआ।
देश की राजधानी में हिंसा फैलाने का जिम्मेदार कौन है? पुलिस की बैरिकेडिंग तोड़कर ट्रैक्टर परेड के लिए पहले से तय रूट की जगह लाल किले तक पहुंचने के लिए किसानों को उकसाने वाले कौन हैं? लाल किले पर धार्मिक झंडा फहराने के पीछे किसकी साजिश है? ये सवाल हर कोई के जेहन में है। पुलिस ने लालकिले की मर्यादा भंग करने वाले दीप सिद्धू और लखा की धड़पकड़ तेज करदी है। दिल्ली पुलिस ने जांच शुरू कर दी है. दिल्ली के कई इलाकों में तांडव करने वाले प्रदर्शनकारियों को पुलिस तलाश रही है. इसी में एक नाम सामने आया है, गैंगस्टर लक्खा सिंह सिधाना का नाम। उसपर पंजाब में दो दर्जन से अधिक मामले दर्ज हैं. इनमें हत्या, लूट, अपहरण, फिरौती जैसे गंभीर अपराध से जुड़े मामले भी हैं।

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