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भविष्य के भारत का शैक्षणिक एजेंडा


शिक्षा किसी भी देश के निर्माण का महत्वपूर्ण अंग होती है। शिक्षा हर मानव में संस्कार को जन्म देती है और संस्कार से मानव समाज का सकारात्मक विकास प्रशस्त होता है। यह वाक्य हजारों सालपुरानी भारतीय हिन्दू संस्कृति की परंपरा को दर्शाता है। प्राचीन काल में गुरुकुलों, आश्रमों तथा बौद्ध मठों में शिक्षा ग्रहण करने की व्यवस्था होती थी। नालन्दा, तक्षशिला एवं वल्लभी जैसे शिक्षा केंद्रोंकी पहचान विश्व स्तर पर थी और विदेशी छात्र भी भारत में शिक्षा के लिए आते थे। लेकिन समय के साथ ऐसे कई शिक्षा केंद्र नष्ट कर दिए गए। मुगल काल से लेकर अंग्रेजों के समय आने तक शिक्षाका स्वरुप बदलता चला गया। अंग्रेजों के काल में शिक्षा की जिस आधुनिक प्रणाली की शुरूवात हुई, उस प्रणाली ने शिक्षा को आम जन से दूर करने का काम किया। भारत को जब स्वतंत्रता मिली तोदेश की सरकारों ने शिक्षा के लिए काम तो किया, लेकिन शिक्षा से आम जनमानस को जोड़ पाने में असफल ही रहे। उनकी असफलता के कारण गरीब, दलित और वंचित समाज शिक्षा से दूर होताचला गया। राजनीति और वोट बैंक की मानसिकता ने सरकारी स्कूलों में मिलने वाली शिक्षा की गुणवत्ता लगातार कम होती गयी, परिणाम निजी शिक्षा केंद्रों और धन आधारित शिक्षा के रूप में देखागया। सभी को शिक्षा देने के लिए कानून भी बनाया गया, लेकिन आम जनमानस के बच्चे गुणवत्तायुक्त शिक्षा से दूर ही रहे।
देश की नयी मोदी सरकार के सामने शिक्षा क्षेत्र के आमूलचूल परिवर्तन की चुनौती भी है। खासतौर पर गरीब, दलित और वंचित समाज के बच्चों के लिए गुणवत्तायुक्त और रोजगारपरक शिक्षा देने केलिए बड़े कदम उठाने की आवश्यकता है। इसके लिए सरकारी स्कूलों में शिक्षा के स्तर को तो सही करना ही होगा, साथ ही उन निजी और महंगे स्कूलों पर भी नकेल कसनी होगी, जिनके लिए शिक्षासिर्फ धन कमाने के साधन से ज्यादा और कुछ नहीं है। गुणवत्तायुक्त और रोजगारपरक शिक्षा को उच्च वर्गों के माध्यम से निम्न वर्गों तक पहुंचना होगा। देश में जब शिक्षा का अधिकार अधिनियमलागू हुआ तो 6 से 14 वर्ष के बच्चों के लिये यह मौलिक अधिकार बन गया। इसके बावजूद शिक्षा के क्षेत्र में चुनौतियों का अंबार लगा है तथा ऐसे उपायों की तलाश लगातार जारी है, जिनसे इस क्षेत्र मेंक्रांतिकारी परिवर्तन लाए जा सकें। मानव संसाधन के विकास का मूल शिक्षा है जो देश के सामाजिक-आर्थिक तंत्र के संतुलन में एक महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती है। हमारे देश का शिक्षा क्षेत्र शिक्षकों कीकमी से सर्वाधिक प्रभावित है। साथ ही राज्यों द्वारा चलाए जाने वाले शिक्षा सुधार कार्यक्रम भी कोई खास उम्मीद नहीं जगा पाए हैं। वर्तमान में विश्वविद्यालयों और कॉलेजों में प्रोफेसरों की जवाबदेहीऔर प्रदर्शन सुनिश्चित करने का कोई फॉर्मूला नहीं है। देश के शिक्षा संबंधी सभी अध्ययन इंगित करते हैं कि शिक्षा के साथ विद्यार्थियों का स्तर भी अपेक्षा से नीचे है। इसके लिये सीधे शिक्षकों को दोषीठहरा दिया जाता है और इस वास्तविकता से आंख बंद कर ली जाती है कि शिक्षा का बुनियादी ढाँचा और शिक्षकों के प्रशिक्षण की व्यवस्था बेहद कमजोर है। देश में एक लाख से अधिक विद्यालय ऐसेहैं, जहाँ केवल एक शिक्षक है। आजादी के 72 वर्ष बाद भी यदि देश में शिक्षा की यह दशा और दिशा है तो स्कूली शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार के सकारात्मक अभियान में सभी का सक्रिय सहयोग लेनाआवश्यक होगा। आर्थिक असमानता की बड़ी वजह मैकाले की शिक्षा नीति है, जो आम लोगों और संभ्रांत वर्ग के बीच फासले को बरकरार रखने के लिए तैयार की गयी थी. मौजूदा शिक्षा व्यवस्था मेंक्या खामी है और नयी शिक्षा व्यवस्था कैसी होनी चाहिए? मैकाले ने अंग्रेजी शासन को कायम रखने के लिए संभ्रांत वर्ग तैयार करनेवाली शिक्षा नीति को बढ़ावा दिया। स्वतंत्रता के बाद भीआधुनिकता के नाम पर यही नीतियां अपनायी गयीं।  

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