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अहंकार में अपना घर फूंक बैठे रालोसपा प्रमुख उपेंद्र कुशवाहा


लोकसभा चुनाव के नतीजें आने के बाद कई पार्टियों के अस्तित्व पर खतरा मंडराने लगा है। इन सब में सबसे बड़ी चुनौती उपेंद्र कुशवाहा और उनकी पार्टी को है जिसने लोकसभा चुनाव से अपना पाला बदल लिया था। उपेंद्र कुशवाहा राजनीतिक महत्वाकांक्षा से प्ररित होकर NDA से अलग हुए और RJD के नेतृत्व वाली महागठबंधन में शामिल हो गए। वैसे भी नीतीश कुमार के NDA में वापस आने के बाद कुशवाहा खुद को उपोक्षित महसूस कर रहे थे। महागठबंधन में शामिल होने के बाद कुशवाहा को पांच सीटें दी गईं लेकिन एक पर भी उनकी पार्टी जीत हासिल नहीं कर पाई। 
उपेंद्र कुशवाहा के राजनीतिक इतिहास को देखें तो काफी दिलचस्प रहा है। नीतीश कुमार के सहारे अपनी राजनीतिक पारी को आगे बढ़ाने वाले कुशवाहा धीरे-धीरे जनता दल यू के बड़े नेता बन गए। इन तमाम घटनाक्रम के बीच कुशवाहा खुद को नीतीश से बड़ा नेता समझने लगे। जानकारों की मानें तो यह बात नीतीश के गले नहीं उतर रही थी और यहीं से दोनों नेताओं के बीच राजनीतिक प्रतिद्वंदिता की शुरूआत हो गई। उपेंद्र कुशवाहा इस भ्रम में जीने लगे कि बिहार में कुशवाहा (6.4% वोट) उनके साथ हैं जो नीतीश के कुर्मी (4% वोट) से ज्यादा है। इस दौरान उपेंद्र कुशवाहा के लिए अच्छी खबर यह रही कि नीतीश NDA से अलग हो गए और कुशवाहा को एक साथी मिल गया। मोदी लहर पर सवार होकर कुशवाहा अपनी तीन सीटें जीतने में कामयाब रहे और उन्हें मोदी कैबिनेट में जगह भी मिल गई। राजनीतिक पंडित यह भी कहते है कि नीतीश को मात देने के लिए भाजपा ने ही कुशवाहा को नई पार्टी बनाने की सलाह दी थी। 
वर्तमान परिदृश्य को देखें तो 2019 के लोकसभा चुनाव में कुशवाहा की पार्टी 5 सीटों पर चुनाव लड़ी थी और कुशवाहा खुद दो सीटों पर लड़े। कुशवाहा अपनी पुरानी सीट काराकट और दूसरी सीट उजीयारपुर से मैदान में थे पर उन्हें जनता ने नकार दिया। यहां तक कि कुशवाहा जाति को अपना वोट बैंक मानकर चलने वाले उपेंद्र महागठबंधन को भी कुशवाहा का वोट ट्रांस्फर नहीं करा पाए। नतीजों से पहले खूनखराबा की बात करने वाले कुशवाहा फिलहाल शांत हैं पर उनकी पार्टी में भूचाल आया हुआ है। कुशवाहा की पार्टी रालोसपा के तीन विधायक जदयू में शामिल हो गए जिनमें से दो विधानसभा और एक विधान परिषद के सदस्य हैं। 

उपेंद्र कुशवाहा के चढ़ते और उतरते राजनीति सफर में उनके साथ बहुत लोग जुड़े पर उन लोगों को कुशवाहा अपने साथ कायम रख नहीं रख सके। अरुण कुमार और नागमणि उपेंद्र के दो मजबूत हाथ थे जिन्होंने खुद को पार्टी के लिए खपा दिया। दोनों के बढ़ते कद से कुशवाहा खुद को असुरक्षित मससूस कर रहे थे और इन्हें पार्टी से बाहर निकालने में उन्होंने देरी नहीं की। ऐसे में हम यह भी कह सकते है कि अपनी पार्टी के इस हाल के लिए कुशवाहा भी जिम्मेदार हैं। 

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