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राजनीतिक परिवर्तन का संकेत तो नहीं है पश्चिम बंगाल की चुनावी हिंसा


लोकसभा चुनाव के हर चरण में हिंसा का दौर जारी है। हर चरण के मतदान के साथ तृणमूल कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी के बीच टकराव भी बढ़ रहा है। तृणमूल कांग्रेस और भाजपा एक-दूसरे पर हमला करने के आरोप लगा रहे हैं। पिछले दो माह से जारी इस चुनाव प्रचार के बीच तीन दशक से अधिक वक्त तक सत्ता पर काबिज रहने वाली लेफ्ट पार्टियां चुनावी बहस से बाहर हैं। वहीं, इस लड़ाई में कांग्रेस अपना पांच साल पुराना प्रदर्शन दोहराने की चुनौती से जुझती दिख रही है।
भाजपा अध्यक्ष अमित शाह के रोड शो के दौरान हिंसा और ईश्वरचंद्र विद्यासागर की प्रतिमा तोड़े जाने की घटना ने आखिरी चरण के मतदान में टकराव के संकेत दे दिए हैं। आखिरी चरण की नौ सीट के लिए दोनों पार्टियां आमने-सामने हैं। वर्ष 2014 के लोकसभा चुनाव में मोदी लहर के बावजूद इन सभी सीट पर तृणमूल कांग्रेस ने जीत दर्ज की थी। इस बार भी मुख्यमंत्री ममता बनर्जी अपना दबदबा बरकार रखना चाहती हैं। पर पश्चिम बंगाल में अपनी सीट और वोट प्रतिशत बढाना चाहती हैं।
सेंटर फॉर द स्टडी ऑफ डेवलपिंग सोसाइटीज (सीएसडीएस) के निदेशक संजय कुमार पश्चिम बंगाल में चुनावी हिंसा को वर्चस्व की लड़ाई मानते हैं। उनका मानना है कि हिंसा हमेशा परिवर्तन का संकेत होती है। यह हिंसा चुनाव के वक्त हो रही है, ऐसे में यह हिंसा एक राजनीतिक परिवर्तन का संकेत दे रही है। हिंसा अमूमन उस वक्त होती है, जब किसी के वर्चस्व को चुनौती दी जाती है। जिसका वर्चस्व होता है, वह उसे रोकता है और नई ताकत उसे तोड़ने की पूरी कोशिश करती है।
पश्चिम बंगाल की राजनीति में तृणमूल कांग्रेस का वर्चस्व है। संजय कुमार का कहना है कि इन चुनाव में भाजपा इस वर्चस्व को तोड़ने की कोशिश कर रही है। यही वजह है चुनाव में हिंसा हो रही है। क्योंकि, तृणमूल के नेता और कार्यकता अपना वर्चस्व बरकरार रखने के लिए विरोध कर रहे हैं। ऐसे में यह राजनीतिक बदलाव के संकेत हैं। अब यह कितना बड़ा परिवर्तन है, यह चुनाव नतीजों से पता चलेगा। पर 2014 के मुकाबले इस बार भाजपा का वोट प्रतिशत और सीट बढ़ना तय है।
कांग्रेस और लेफ्ट पार्टियां पश्चिम बंगाल के चुनाव प्रचार में बहस से दूर हैं। दोनों पार्टियों गिनी चुनी सीट तक सिमट कर रह गई हैं। ऐसे में पश्चिम बंगाल में असल लड़ाई तृणमूल कांग्रेस और भाजपा के बीच है। इस लड़ाई में लेफ्ट के वोट प्रतिशत में कमी आ सकती है। पिछली बार लेफ्ट पार्टियों को 29 फीसदी वोट के साथ दो सीट मिली थी। जबकि कांग्रेस दस प्रतिशत वोट के साथ चार सीट जीतने में सफल रही थी। राजनीतिक जानकार मानते हैं कि इस बार दोनों का वोट प्रतिशत घट सकता है।

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