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राष्ट्र-चिंतन : पर ‘ जसोदा बेन ‘ मोहरा बनती नहीं

जसोदा बेन तो प्रेरणा के स्रोत हैं, वह तो गर्व की मूर्ति हैं, लोभ, लालच से परे, लोकप्रियता 
भी उन्हें नहीं चाहिए, अपने परिवार को भी नियंत्रण में रखी हैं, इसीलिए विपक्ष असफल है

चुनावी अभियान में भाषा की मर्यादा छिन्न-भिन्न हुई है, नैतिकता और सभ्यता का घोर अभाव है, यह लगता नहीं है कि सभ्य या नैतिक लोग जय-पराजय की चुनावी लडाई लड रहे हैं, सिर्फ यही लगता है कि पशुतापूर्ण लडाई चल रही है, यह कहना भी गलत नहीं होगा कि चुनावी राजनीति में पशुता से भी आगे बढ गये हैं। कोई चैकीदार चोर कह रहा है तो कोई मरे हुए व्यक्ति को चुनावी अभियान में लाभ लेने की कोशिश कर रहा है, कोई प्रधानमंत्री को प्रधानमंत्री नहीं मानने की बात कह रहा है, कोई प्रधान मंत्री को चाटा मारने की बात कर रहा है, कोई 1984 के सिख दंगे को जस्टीफाई करने के लिए कह रहा है कि हुआ सो हुआ, कोई चुनाव के बाद अपने विरोधियों को जेल भेजने की बात कर रहा है, कोई कह रहा है कि जो पूरा परिवार जमानत है पर उसे भ्रष्टचार-कदाचार पर बोलने का अधिकार नहीं है। उर्पयुक्त सभी अनावश्यक और अमान्य बातें सिद्ध करती है कि आज की हमारी राजनीति कितनी असभ्य और कितनी भयानक हो गयी है, हथकंडों और असभ्य भाषा के प्रयोग कर अपने लिए सत्ता अर्जित का खेल खेला जा राह है।
                  लेकिन इस चुनाव में और  भी उल्लेखनीय बातें हैं जिस पर नजर होनी चाहिए, जिस पर विमर्श होना चाहिए और यह भी देखा जाना चाहिए कि वे बातें विपक्ष के लिए यानी नरेन्द्र मोदी के विरोधियों के लिए शक्ति क्यों नहीं बन पाती है, हथकंडा क्यों नहीं बन पाती है, उस बात पर मोदी को घेरने के लिए राजनीतिक सफलता क्यों नहीं मिल पाती हैं। अब यहां यह प्रश्न उठता है कि वह बात कौन सी है और उस बात से नरेन्द्र मोदी और नरेन्द्र मोदी के विरोधियों के बीच किस प्रकार से शह-मात का खेल जारी रहता है? यह बात नरेन्द्र मोदी की पत्नी जसोदा बेन से जुडी हुई है। अभी-अभी कि चुनावी राजनीति की ही बात नहीं है बल्कि बात अभी-अभी से भी पुरानी बात है, बात तो तब शुरू हुई थी जब नरेन्द्र मोदी गुजरात के मुख्य मंत्री बने थे। जब नरेन्द्र मोदी गुजरात के मुख्यमंत्री बने थे तब उनके विरोधियों ने जसोदा बेन को लेकर राजनीतिक हमले करते रहे थे, जासोदा बेन को राजनीतिक मोहरा बनाने की कोशिश करते रहे थे। पर इसमें नरेन्द्र मोदी के विरोधियों को कोई सफलता नहीं मिली थी, सबसे बडी विशेषता की बात यह थी कि खुद जसोदा बेन मोहरा या फिर राजनीतिक हथकंडा बनने के लिए तैयार नहीं हुई थी। जब नरेन्द्र मोदी 2014 के लोकसभा चुनाव में प्रधानमंत्री के उम्मीदवार घोषित किये गये थे तब भी जसोदा बेन का प्रशंग उछाला गया था, खासकर कांग्रेस के नेता रेनुका चैधरी ने कहा था कि जो अपनी पत्नी को न्याय नहीं दे सका वह व्यक्ति प्रधानमंत्री के रूप में देश के साथ न्याय कर सकता है क्या? कई अन्य विरोधी नेताओं के भी इससे भी बढ कर आलोचनाएं थी। फिर भी जनता के उपर कोई प्रभव नहीं पड सका और नरेन्द्र मोदी बहुमत के साथ सत्ता में आये और प्रधानमंत्री की कुर्सी पर बैठे।
              अभी-अभी के चुनावी वातावरण में जसोदा बेन को लेकर किस प्रकार के चुनावी राजनीति हो रही है, जसोदा बेन को लेकर किस प्रकार की आलोचनाएं जारी हैं, उसके कुछ उदाहरण यहां प्रस्तुत है। मायावती कहती है कि नरेन्द्र मोदी ने राजनीतिक स्वार्थ की पूर्ति के लिए पत्नी जसोदा बेन को छोड दिया, दूसरों की मां-बहन और बेटियों की पीडा और इज्जत को ये कैसे समझ पायेंगे, ये खुद अपनी पत्नी की पीडा को समझ नहीं सके, सिर्फ इतना ही नहीं बल्कि मायावती ने वोटरों से जसोदा बेन की कसौटी पर मोदी के पक्ष में मतदान नहीं करने की अपील तक कर डाली। विपक्षी एकता के सूत्रधार बनने की राह पर चलने वाले चन्द्रबाबू नायडू का जसौदा बेन की कसौटी पर राजनीतिक हमले को देख लीजिये। चन्द्रबाबू नायडू ने कहा कि आप अपनी पत्नी से अलग रहते हैं, क्या परिवार के मूल्यों के प्रति आपने मन में कोई जगह भी है, नरेन्द्र मोदी का न तो कोई परिवार है और न ही कोई बेटा। अखिलेश यादव ने नरेन्द्र मोदी को पत्नी छोड़वा तक कह डाला था। चारा घोटाले में जेल की सजा काट रहे लालू का बेटा तेजस्वी यादव ने भी जसोदा बेन को लेकर काफी तीखी और अस्वीकार बाते की हैं।
               जसोदा बेन से जुडे हुए उर्पयुक्त तथ्य क्या कहते हैं, इसके पीछे का असली मकसद क्या है, चुरावी राजनीति मंशा क्या रही है? जहां तक राजनीतिक मंशा की बात है तो यह अस्वीकार नहीं किया जा सकता है कि जसोटा बेन को कसौटी बना कर नरेन्द्र मोदी की छवि को खराब करना, नरेन्द्र मोदी को परिवार के मूल्यों के विरूद्ध खडा करना, जब नरेन्द्र मोदी को परिवार के मूल्यों के खिलाफ खडा कर दिया जायेगा तब जनता के बीच छवि कैसे और क्यों नहीं खराब होगी, जब जनता के बीच छवि खराब होगी तब फिर जनता खिलाफ में वोट जरूर करेगी। अभी-अभी हम यह नहीं कह सकते हैं कि नरेन्द्र मोदी विरोधी राजनीतिक नेताओं की यह सिर्फ और सिर्फ खुशफहमी ही है। यह सही है कि गुजरात में 12 सालों तक यह कसौटी कोई नकरात्मक भूमिका नहीं निभा पायी थी, 2014 के लोकसभा चुनाव में भी इस कसौटी पर राजनीतिक गर्मी कोई भूमिका नहीं निभा पायी थी। हो सकता है कि इस लोकसभा चुनाव में यह कसौटी कोई नकारात्मक भूमिका निभायेगी? नरेन्द्र मोदी विरोधियों को ऐसी ही उम्मीद है। राजनीति में प्रत्येक कसौटी पर उम्मीद जागती है, विपक्ष की उम्मीद पर उंगली नहीं उठायी जानी चाहिए।
         अब यहां यह भी प्रश्न है कि जसौदा बेन विपक्ष के मोहरे या फिर हथकंडे बनने के लिए तैयार क्यों नहीं होती है? नरेन्द्र मोदी विरोधी राजनीति दलों ने अपनी कोशिश कर देख चुके हैं, जसोदा बेन को नरेन्द्र मोदी के खिलाफ खडा करने की सारे हथकंडे अपना चुके हैं, लोभ-लालच का भी पाशा फेका गया। सिर्फ नरेन्द्र मोदी विरोधी राजनीतिक पार्टियों की ही बात नहीं है बल्कि मीडिया भी अपने प्रयास कर देख लिया है। मीडिया कोई एक दो साल नहीं बल्कि गुजरात में नरेन्द्र मोदी के 12 सालों के कार्यकाल के दौरान और नरेन्द्र मोदी के केन्द्रीय सत्ता के पांच साल यानी कुल 17 सालों तक प्रयास कर चुका है, जसोदा बेन का मुंह खुलवाने के हर संभव कोशिश कर चुका है। राजनीतिक नेताओं , राजनीतिक दलों की तरह ही मीडिया को भी नकामी मिली है। मीडिया आज तक जसौदा बेन का पूर्ण साक्षात्कार तक नहीं ले सका। मीडिया की यह नकामी बहुत बडी है।
           जसोदा बेन की पीडा को समझा जाना चाहिए, जसौदा बेन की पीडा को अस्वीकार नहीं की जा सकती है। जसौदा बेन और नरेन्द्र मोदी के बीच प्रारंभिक दौर में अलगाव के असली कारण भी अभी तक सामने नहीं आये हैं। सिर्फ और सिर्फ नरेन्द्र मोदी के अध्यात्मिक यात्रा ही सामने आयी है। शादी के प्रारभिक दैर में नरेन्द्र मोदी के अंदर अध्यात्मिक यात्रा जागृत हुई थी। स्पष्ट यह है कि नरेन्द्र मोदी करीब पांच साल तक हिमालय की गुफा और अन्य जगहों पर अध्यात्मिक शक्ति की खोज में लिन थे। उसके बाद नरेन्द्र मोदी संघ के जीवनदानी बने थे। अघ्यात्मिक यात्रा और संघ के जीवनदानी होने को ही जसोदा बेन और नरेन्द्र मोदी के बीच संबंध विच्छेद का कारण माना जा रहा है।
             निसंदेह तौर पर जसोदा बेन की दृढ इच्छा का सम्मान किया जाना चाहिए, निसंदेह तौर पर जसोदा बेन को लोभ-लालच से उपर स्वीकार किया जाना चाहिए, सिर्फ इतना ही नहीं बल्कि जसोदा बेन को एक मिसाल और प्रेरणा के तौर पर देखा जाना चाहिए। अभी भी कानूनी तौर जसोदा बेन प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की पत्नी हैं। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के पत्नी के तौर पर जसोदा बेन का जीवन एक प्रेरणा से कम नहीं है। उनके अंदर कोई कुइच्दाएं नहीं हैं, उन्होंने सरकारी सुविधाएं भी नहीं ली है, अंहकार भी उनके अंदर नहीं है, लाभ और लोकप्रियता पाने की इच्छाओं से भी ये मुक्त हैं। अपने मायके के परिजनों को भी जसोदा बेन नियंत्रित कर रखी है, उनका परिवार भी कोई ऐसा कार्य अब तक नहीं किये हैं जिससे नरेन्द्र मोदी की छवि खराब हो सके। आज राजनीति में छवि खराब होने और कई आरोपों का समाना करने की कसौटी पर परिवार बन जाता है। भारतीय राजनीति में ऐसे हजारों उदाहरण सामने हैं। शायद नियति को वह अपना भाग्य मानती हैं। इसीलिए जसोदा बेन विपक्ष का मोहरा और हथकंडा बनने के लिए तैयार नहीं हैं।

                                                                                                                                          विष्णुगुप्त

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