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राष्ट्रहित में राष्ट्रवाद के व्यापक अर्थों को आत्मसात करने की जरूरत

दुनिया की सबसे बड़ी लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं में से एक हमारा देश इस समय लोकतंत्र के महापर्व को जोरों-शोरों के साथ मना रहा है। इस बीच तमाम राजनैतिक प्रतिनिधि अपने-अपने दावों और वादों के साथ जनता के बीच जा रहे हैं और अगले पांच साल के लिये पुनः एक नई व्यवस्था को रूप देने के तमाम वादे भी कर रहे हैं। पिछले कुछ समय में घटनाक्रम कुछ इस तरह से गुजरा है कि राजनैतिक सत्ता हासिल करने का प्रयास करने वाले सभी दलों के सारे मुद्दे राष्ट्रवाद और साम्प्रदायिक मुद्दों के इर्द-गिर्द ही घूमने लगे हैं। विभिन्न राजनैतिक दलों और नेताओं द्वारा राष्ट्रवाद की अपने ढंग की परिभाषा गढ़ने और स्वयं को राष्ट्रवादी घोषित करने के प्रयास भी किये जा रहे हैं। हर कोई स्वयं को राष्ट्र के प्रति समर्पित दिखाने की इस होड़ में सबसे अग्रणी पंक्ति में दिखने हेतु प्रयासरत है। ऐसी स्थिति में प्रश्न यह उठता है कि जब हर तरफ राष्ट्रवाद का उन्माद है तो इस जनाक्रोश की परिणति राष्ट्र की विभिन्न जटिल समस्याओं के समाधान के रूप में क्यों नहीं हो रही है? एक ओर स्थिति यह है कि जब भी राष्ट्रीय सरोकारों से जुड़ी कोई बड़ी खबर मीडिया की सुर्खियों में आती है, तब हम देखते हैं कि सड़कों, चौराहों, मीडिया, सोशल मीडिया समेत तमाम मंचों पर जनाक्रोश राष्ट्रवाद में डूबा नजर आता है। बीते कुछ वर्षों की ही बात की जाये तो, ऐसी स्थिति हम दिल्ली के निर्भया काण्ड, अन्ना हजारे के आन्दोलन, हाल ही में हुए पुलवामा अटैक, विंग कमाण्डर अभिनन्दन की वापसी समेत तमाम इस तरह के मौकों पर देख चुके हैं, जब राष्ट्रवाद की भावना लोगों के सर चढ़कर बोलती है। दूसरी ओर जमीनी स्तर पर दृष्टिपात करने पर अस्तित्व में दिखती विकराल बेरोजगारी, लचर शिक्षा व्यवस्था, लचर सार्वजनिक यातायात सुविधायें, भ्रष्टाचार, हिंसा, बाल श्रम, बलात्कार, भुखमरी, साम्प्रदायिक और जातिवादी हिंसा की घटनाओं से लबरेज मीडिया, एक-दूसरे पर हिंसक शब्दों से बार करते तमाम सोशल मीडिया उपभोक्ता कुछ दूसरे हालात बयां करते हैं। 
सामान्य शब्दों में यदि राष्ट्रवाद के अर्थों को समझने का प्रयास किया जाये तो राष्ट्रवाद का अर्थ किसी राष्ट्र के नागरिकों द्वारा राष्ट्र के प्रति निष्ठा, राष्ट्र की प्रगति और राष्ट्र के सभी नियमों-आदर्शों को बनाये रखने की भावना ही है। जनसंख्या की दृष्टि से विश्व में दूसरा स्थान रखने वाला भारत एक ऐसा देश है, जहॉं सदियों से विभिन्न जाति-सम्प्रदायों के लोग, विभिन्न भाषायें बोलने वाले, विभिन्न संस्कृति वाले एवं विभिन्न धार्मिक-राजनैतिक आस्थाएं रखने वाले लोग साथ-साथ रहते रहे हैं। इस दृष्टिकोण से विभिन्नता में एकता के मूलभाव वाले भारत के पास मानवीय संसाधनों का विशाल भण्डार है, लेकिन जब विशाल मानवीय संसाधन होने के बाबजूद भी राष्ट्र तमाम जटिल समस्याओं का सामना करता है तो राष्ट्र के नागरिकों की राष्ट्रवाद की भावना पर प्रश्न चिन्ह लगता सा प्रतीत होता है।
आज यदि राष्ट्र के जमीनी हालात के विषय में चर्चा की जाये तो यह किसी से छिपा नहीं है कि साम्प्रदायिकता, जातिवाद, आरक्षण की मांग, आरक्षण को समाप्त करने की मांग जैसे मुद्दों पर हम सब आये दिन किस प्रकार एक-दूसरे के कट्टर विरोधी बने नजर आते हैं। साम्प्रदायिकता और जातिवादी हिंसाओं की खबरें भी आये दिन मीडिया की सुर्खियों का हिस्सा बनती हैं, इस प्रकार की तमाम हिंसा की घटनाओं में जानमाल और राष्ट्र के तमाम संसाधनों का नुकसान होना एक आम बात है। हिन्दुओं-मुस्लिमों के बीच साम्प्रदायिक सौहार्द की पकड़ भी निरन्तर ढीली होती जा रही है और 2017 के सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाबजूद इस समय चल रहे चुनावी लोकतंत्र के बीच तमाम राजनैतिक मंचों से खुले शब्दों में हिन्दू-मुस्लिम मुद्दे को उजागर करके राजनैतिक लाभ लेने के प्रयास लगातार किये जा रहे हैं। सरकारी और निजी क्षेत्रों में भ्रष्टाचार भी नित नये-नये रूपों में नजर आ रहा है। विभिन्न उद्यमियों द्वारा भी अपने निजी स्वार्थों के लिये देश के प्राकृतिक संसाधनों का दोहन तो किया ही जा रहा है, साथ ही देश की नदियों और वातावरण को प्रदूषित करने के दूरगामी परिणाम सोचे बिना ही अपने हित साधे जा रहे हैं। आंकड़ों की बात की जाये तो गत वर्ष फरवरी में गृह राज्यमंत्री हंसराज अहीर ने एक सवाल के जबाव में साम्प्रदायिक घटनाओं के आंकड़े लोकसभा के साथ साझा किये थे, इनके अनुसार वर्ष 2017 में 822 साम्प्रदायिक हिंसा की घटनायें हुईं थीं, जिनमें 111 लोग मारे गये थे और 2384 घायल हुए थे। गत वर्ष ही कासगंज में जिस प्रकार गणतंत्र दिवस के दिन एक युवक की हत्या के बाद साम्प्रदायिक गतिरोध बढ़ा, वह किसी से छिपा नहीं है। आरक्षण के पक्ष और विरोध में हुए तमाम हिंसक प्रदर्शनों के समय हुए नुकसान को हम सब मीडिया की सुर्खियों का हिस्सा बनते देखते ही हैं। 
जमीनी स्तर पर राष्ट्र को हानि पहुंचा रही इन समस्याओं से जूझ रहे राष्ट्र में क्या हम एक ऐसी आदर्श व्यवस्था को विकसित किये जाने का प्रयास नहीं कर सकते, जहॉं धार्मिक-जातिगत पूर्वाग्रहों से परे सभी नागरिकों के अर्न्तमन में राष्ट्रवाद की उस व्यापक परिभाषा को स्थापित कर दिया जाये, जहॉं राष्ट्र के किसी भी संसाधन, सम्पदा को हानि पहुंचाते वक्त, राष्ट्र के विभिन्न संवैधानिक कानूनों-नियमों को तोड़ते वक्त कोई भी नागरिक स्वयं को राष्ट्रद्रोह के अपराधबोध से ग्रस्त पाये? जहॉं साम्प्रदायिक वैमनस्यता जैसी भावना आने से पूर्व एक नागरिक दूसरे धर्म के व्यक्ति को भारतीय नागरिक के तौर पर देखकर आपसी सौहार्द की गरिमा को बनाये रखने का प्रयास कर सके, जहॉं सभी नागरिक राष्ट्रवाद के उस व्यापक अर्थ से परिचित हो सकें, जिसमें राष्ट्र की संकल्पना मात्र भारत के मानचित्र (नक्शे), भौगोलिक भू-क्षेत्र, राष्ट्रीय प्रतीकों, राष्ट्रीय गीतों, राष्ट्रीय दिवसों तक ही सीमित न हो, बल्कि राष्ट्र की व्यापक संकल्पना में राष्ट्र के सभी जाति-धर्मों के नागरिक, राष्ट्र की प्राकृतिक संपदा, संस्कृति, पर्यावरण भी समाहित हों, जहॉं राष्ट्र के सभी धर्मों के अनुयायी धर्म को नितान्त निजी मामले तक सीमित रख राष्ट्रहित को सर्वोपरि रखने  पर विचार कर सकें? लेकिन जिस दौर में रॉलेट एक्ट का विरोध करने के लिये देश के सभी हिन्दू-मुस्लिमों को एक मंच पर लाने वाले महात्मा गॉंधी के पुतले को भी गोली मारकर हिंसक भावनाओं को प्रदर्शित किया जा रहा हो, विभिन्न राजनैतिक मंचों से मात्र राजनैतिक लाभ लेने के उद्देश्य से जाति-धर्म के आधार पर वैमनस्यता फैलाने वाले बयान दिये जा रहे हों, उस दौर में इस राष्ट्रवाद की व्यापक संकल्पना को स्थापित करने को आगे आयेगा कौन? मुश्किल दौर में यह एक बड़ा प्रश्न है, जिसका हल राष्ट्रवाद की उस संकल्पना के सहारे तो बिल्कुल भी नहीं ढूंढा जा सकता जिसमें हम राष्ट्रवाद को किसी भी राजनैतिक दल द्वारा गढ़े गये सीमित अर्थों तक समझने का प्रयास करते हों। 

                                                                                          पंकज यादव, असिस्टेन्ट प्रोफेसर, 
                                                                                रक्षपाल बहादुर टीचर्स ट्रेनिंग इन्स्टीट्यूट, बरेली

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