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शिक्षा की गुणवत्ताः चाहत, भ्रम, ईच्छा या दिखावा

वर्तमान में 69000 षिक्षक पदों पर नियुक्ति के सम्बन्ध में आये लखनऊ उच्च न्यायालय व इलाहाबाद उच्च न्यायालय के निर्णय वास्वविकता के धरातल पर एक षिक्षक को बहुत झकझोर देने वाले हैं, निसंस्देह हमें सभी न्यायालयों के निर्णयों का सम्मान करना चाहिए परन्तु हम सभी जानते हैं कि षिक्षा ही किसी भी देष की उन्नति की आधारषिला है। लेकिन यह बेहद चिन्ताजनक है कि हम आजतक षिक्षा की गुणवत्ता को निष्चित करना तो दूर षिक्षा की गुणवत्ता को उचित ढ़ग से परिभाषित तक नहीं कर सके हैं। आज के इस तकनीकी युग में भी हमें किस स्तर पर कितनी और किस प्रकार की षिक्षा गुणवत्ता की आवष्यकता है इस सम्बन्ध में कोई विषेष सन्तोषजनक उत्तर किसी से प्राप्त होता प्रतीत नहीं होता। सब अन्धकारमय है सब एक शब्द भाग्य के भरोसे ही। यद्यपि सरकार ने षिक्षा के सार्वभौमीकरण की संकल्पना को पूर्ण करने के लिए सर्व षिक्षा अभियान और आर.टी.ई एक्ट जैसे महत्वपूर्ण योजनाओं का प्रावधान तो किया परन्तु इनसे षिक्षा की गुणवत्ता की आधारषिला कमजोर होती ही प्रतीत होती है क्योंकि ये दोनों कार्यक्रम ही छात्रों की नामांकन वृद्धि की बात पर जोर देते तो प्रतीत होते है परन्तु गुणवत्ता युक्त षिक्षा की व्यवस्था के प्रावधान में विस्वसनीयता हेतु गम्भीर होते प्रतीत नहीं होते। इनमें षिक्षा में गुणात्मकता के विचार से ऑपरेषन ब्लैकबोर्ड, 2005 में लाया गया जिससे छात्रों की संख्या के अनुसार ही षिक्षकों व कक्षा कक्षों की व्यवस्था की गई परन्तु वर्तमान में भी विद्यालयों में इस सन्दर्भ में विसंगतियॉ स्पष्ट रूप से देखी जा सकती हैं, इसी क्रम में छात्रों के अधिगम स्तर को सुनिष्चित करने हेतु 2017 में सीखने के प्रतिफल लाये गये हैं जिन्हें गत शैक्षिक सत्र 2017-18 से लागू किया जा रहा है ये प्रयास कितना सफल होगा ये तो भविष्य ही तय करेगा परन्तु वर्तमान में इस सन्दर्भ में बहुत से प्रष्न है जोकि षिक्षा व उसकी गुणवत्ता को आहत करते दिखार्इ्र देते हैं। 
  1- विभिन्न समाचार पत्रों, समाचार चैनल के प्रसारणों में यह प्रायः दिखाया जाता रहा है कि बहुत से ऐसे षिक्षक भी हमारी सार्वभौमिक षिक्षा प्रणाली का हिस्सा हैं जो कक्षा-कक्ष में कराये जाने वाले साधारण सवालों के उत्तर दे पाने में समर्थ नहीं है और यह सबके संज्ञान में भी है तो सबसे पहला प्रष्न तो यही है कि ऐसे लोग षिक्षक बन कैसे जाते हैं? क्या इनकी अन्तरआत्मा इन्हें कभी नहीं झकझोरती कि हम किसी एक के नहीं अपितु देष के भविष्य के साथ खिलवाड़ कर रहे हैं? और क्या इतने महत्वपूर्ण पद, जिसे हम देष के निर्माता का नाम देते है,ं पर चयन की कोई भी गुणवत्तापरक कसौटी तक विकसित कर सकने में हम असमर्थ हैं? प्रष्न यह भी है कि क्या इन षिक्षकों के अनुभवी हो जाने पर हम जीवन भर इन्हें ढ़ोते रहेंगें या इस पद हेतु योग्यता का प्रतिबर्ष सतत् मूल्यांकन षिक्षा की गुणवत्ता को निर्धारित करेगाा? षिक्षा की गुणवत्ता की संकल्पना के इस युग में आप ऐसे अनुभव का आप किस तरह प्रयोग कर सकेंगें जिसमें अपने अनुभव के आधार पर एक परीक्षा पास करने तक की काबिलियत न हो जबकि उसका स्तर केवल 40 से 50 प्रतिषत अंक लाना तक सीमित हो, जो स्वंय अद्यतन नहीं रह सकते उससे नवनिर्माण कराने एवं किसी निर्धारित गुणवत्ता में सहयोग का विचार तक बेमानी ही प्रतीत होता है। षिक्षक की कसौटी पर सिर्फ और सिर्फ एक पैमाना एवं योग्यता ही खरी उतरती है और वो है कौषल। जब षिक्षक में कौषल ही नहीं होंगें तो उससे किसी भी गुुणवत्ता की बात करना व्यर्थ ही होगा। अतः वर्तमान की स्थितियां और विसंगतियां स्वतः ही इस बात की ओर ध्यानाकर्षित करती हैं कि गुणवत्तापूर्ण षिक्षा की कसौटी क्या सच में कभी वास्तविक धरातल पर अवतरित होगी? क्या कोई सरकार इसके प्रति गम्भीर है? या फिर ये सब भावी पीढ़ी के लिए स्वप्न सरीखा है? या फिर ये सिर्फ राजनीतिक मंच तैयार करने हेतु एक जानबूझ कर उत्पन्न किया गया एक भ्रम मात्र है।
                                                                                                                       मोर पाल सिंह
                                                                                                                    सहायक प्राध्यापक

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