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छेदा टोपी,बकरा दाढी और सेक्युलर बेवफाई


पहला तथ्य.... तथाकथित सेक्युलर पार्टियां बेवफा हो गयी ...  जामा मस्जिद के इमाम।
दूसरा तथ्य ... कांग्रेस प्रत्याशी भी हिन्दुओं की डर से मुझे प्रचार के लिए नहीं बुलाते...  गुलाम नवी आजाद
तीसरा तथ्य .... भाजपा बढती गयी, मुसलमानों का प्रतिनिधित्व घटता गया।
चौथा तथ्य...  तथाकथित सेक्युलर पार्टियों के चुनावी दफ्तर में छेदा टोपी और बकरा दाढी रखने वाले मुसलमानों पर अप्रत्यक्ष प्रतिबंध।
पांचवां तथ्य .... सच्चर कमिटी की रिपोर्ट अब किसी राजनीतिक पार्टियों को याद क्यों नहीं आ रही है?

उपर्युक्त ये पांचों तथ्य क्या कहते हैं? क्या ये पांचों तथ्य क्या तथाकथित सेक्युलर पार्टियों की बेवफाई व्यक्त नहीं करते हैं? ये पांचों तथ्य की कसौटी पर क्या यह तिरस्कार और उपेक्षा लोकतांत्रिक माना जायेगा या फिर गैर लोकतांत्रिक माना जाना चाहिए? अगर इन पांचों तथ्यों की कसौटी पर इसे लोकतांत्रिक मान लिया गया तो फिर भारतीय लोकतंत्र की खुबसूरती कैसे मानी जायेगी, अगर यह खुबसूरती भी अस्तित्वहीन हो जायेगी तो फिर भारत के लोकतंत्र को दुनिया का सर्वश्रेष्ठ लोकतंत्र में गिनती कयों होनी चाहिए? 
      क्या इसके लिए सिर्फ और सिर्फ भारतीय जनता पार्टी की ही डर हथकंडा बन कर तथाकथित सेक्युलर पार्टियों के सिर पर नाचती है? क्या इसके लिए मुस्लिम आबादी की सांप्रदायिकता भी जिम्मेदार है, क्या मुस्लिम आबादी की आतंकवादी नीति भी जिम्मेदार है? क्या इसके लिए लिए मुस्लिम वर्ग के उन चंद बीमार मानसिकता भी जिम्मेदार है जो देशभक्ति को भी मजहब की कसौटी पर तोलते हैं और हर लोकतांत्रिक मूल्यों को गैर इस्लामी घोषित कर देते हैं? क्या ये पांचों तथ्य यह निष्कर्ष नहीं देते हैं कि सेक्युलर पार्टियां मुसलमानों का वोट तो हासिल करना चाहती हैं, समर्थन लेना तो चाहती हैं, वोट और समर्थन लेकर अपनी सत्ता किस्मत तो चमकाना चाहती हैं पर उन्हें अब न तो उचित प्रतिनिधित्व देना चाहती हैं और न ही सम्मान देना चाहती हैं।
            खासकर जामा मस्जिद के इमाम की बात या पीडा अस्वीकार नहीं हो सकती है, उनकी पीडा स्वाभाविक है। उनके पूराने दिन चले गये। लोकसभा या फिर विधान सभा चुनावों में सेक्युलर राजनीतिक पार्टियों मक्ख्यिों की तरह जामा मस्जिद के इमाम के आस-पास चक्कर लगाती थी और अपने पक्ष में फतवा दिलाने के लिए चरणवंदना करती थी। लालू, मुलायम, रामबिलास पासवान सहित कांग्रेस का ऐसा कौन नेता शेष था जो जामा मस्जिद के इमाम की चरण वंदना करने नहीं जाता था। जामा मस्जिद के इमाम भी बहुत शौक और हिम्मत के साथ अपने मनपंसद पार्टी के समर्थन में फतवा जारी करता था और फतवे का अर्थ और अनर्थ यह होता था कि इस्लाम खतरे में हैं। जामा मस्जिद के इमाम ने समझ लिया था कि मुस्लिम उनका ही गुलाम है और तथाकथित सेक्युलर पार्टियां यह समझ ली थी कि मुस्लिम आबादी जिसको समर्थन करती रहेगी, सत्ता उन्ही को मिलेगी?
यह भ्रम टूटा कैसे? इस भ्रम को तोडा किसने? इस भ्रम को हिन्दू आतंकवाद के प्रोपगंडा ने तोडा। इस भ्रम को तथाकथित सेक्युलर राजनीतिक दलों की मुस्लिम परस्ती ने तोडा। कांग्रेस का हिन्दू आतंकवाद का प्रोपगंडा आत्मघाती साबित हुआ, कांग्रेस और अन्य सेक्युलर पार्टियों का अति मुस्लिम परस्ती आत्मघाती साबित हुआ। राजनीतिक स्थिति यह थी कि जो सेक्युलर नेता हिन्दुओं को जितना गाली देता था और जितना अपमानजनक बात करता था उतना ही और बडा नेता बन जाता था। इसी मानसिकता के तहत रामसेतु प्रकरण पर भगवान राम के अस्तित्व को नकार कर काल्पनीक कह डाला गया। आज कांग्रेस पीछे हटते हुए कह रही है कि उसने हिन्दू आतंकवाद शब्द का प्रयोग नहीं किया था।  इसका दुष्परिणाम यह हुआ कि हिन्दुओ के बीच पुर्नजागरण की हवा बह गयी।
2014 का लोकसभा चुनाव मुस्लिम राजनीति, तथाकथित सुक्युलर राजनीति, कांग्रेस की राजनीति के लिए दुस्वप्न साबित हुआ। सारे सर्वेक्षणों को ध्वस्त करते हुए हिन्दूवादी सत्ता कायम हो गयी। आम तौर पर विकसित तथ्य है कि मुस्लिम किसी भी परिस्थिति में भाजपा को वोट नहीं करते हैं। मुस्लिम के वोट नहीं करने के बाद भी मोदी प्रधानमंत्री बन गये। कांग्रेस यह मान चुकी थी कि मुस्लिम परस्ती छवि के कारण हिन्दुओं का राजनीतिक पुर्नजागरण हुआ और उनकी सत्ता चली गयी। 2014 के लोकसभा चुनाव के बाद महाराष्ट्र, हरिणाणा, झारखंड, उत्तर प्रदेश, त्रिपुरा आदि कई राज्यों में हिन्दुत्व के बल पर मोदी ने सत्ता स्थापित कर डाली। उत्तर प्रदेश जैसे जातिवादी और मजहबी गठजोड वाले प्रदेश में भी मोदी और योगी ऐसे बोले जिससे अखिलेश, मायावती और कांग्रेस चारो खाने चित हो गये। अयोध्या में कारसेवकों पर गोलियां चलवाने की वीरता बखारने वाले मुलायम और अखिलेश का ऐसे प्रश्नों पर मुंह बंद हो गया।
राजनीतिक संदेश क्या स्थापित हुआ? पहला राजनीतिक संदेश स्थापित यह हुआ कि हिन्दू अपने बल पर सत्ता हटा सकते हैं, सत्ता को धूल चटा सकते हैं, सत्ता बना सकते हैं, सत्ता को निरंतर गतिमान कर सकते हैं। हिन्दुओं का अपमान और तिरस्कार करने वाली राजनीतिक पार्टियां अग्नि की स्वाहा हो जायेंगी। दूसरा संदेश यह गया कि मुस्लिम आबादी किसी भी परिस्थिति में अब सत्ता को नियंत्रित नहीं कर सकती है, सत्ता को कटपुतली की तरह नहीं नचा सकती हैं, मुस्लिम मतो की सौदागरी अब घाटे का सौदा है। जिधर जायेगी मुस्लिम आबादी उधर हिन्दू आबादी नहीं जायेगी। मुसलमानों का समर्थन पाने से हिन्दुओ का गुस्सा सातवें आसमान पर जायेगा। इसके अलावा यह भी संदेश गया कि मुस्लिम प्रत्याशी को लोकसभा-विधान सभा का टिकट देने का अर्थ है कि जीत भाजपा की झोली में डालना, क्योंकि हिन्दू आबादी मुस्लिम प्रत्याशी को वोट करेगी नहीं। यह सही है कि पहले तथाकथित सेक्युलर पार्टियां बडी उत्साह के साथ और बडे अभिमान के साथ मुस्लिम को प्रत्याशी बनाती थी, मुस्लिम प्रत्याशी हिन्दू समर्थन से जीत भी जाते थे। पर हिन्दू पुर्नजागरण के अस्तित्व में आने के साथ ही साथ तथाकथित सेक्युलर राजनीति पार्टियांें के द्वारा खडे किये गये मुस्लिम प्रत्याशियों की जीत कठिन होती चली गयी, मुश्किल होती चली गयी और भाजपा की जीत की गारंटी भी बनती चली गयी। इसका दुष्परिणाम क्या हुआ? अब इसके दुष्परिणाम बडे खतरनाक सामने आ रहे हैं, इसके दुष्परिणामों पर गंभीर चिंता हो रही है। दुष्परिणाम यह है कि लोकसभा और विधान सभाओं में मुस्लिम आबादी का प्रदर्शन लगातार घट रहा है, यह स्थिति सुधरनी नहीं हैं। यह स्थिति क्यों नहीं सुधरेगी? इसलिए नही सुधरेगी की राजनीतिक स्तर पर हिन्दू-मुस्लिम की खाई और चौडी होने वाली है।
तथाकथित सेक्युलर पार्टियां का एक घिनौना चेहरा भी अब बेपर्द हो रहा है। पिछले गुजरात विधान सभा के चुनाव में एक बडी राष्ट्रीय पार्टी के दफ््तर में छेदा टोपी पहनने और बकरा दाढी रखने वाले मुस्लिम नेताओं के प्रवेश पर प्रत्यक्ष तौर पर प्रतिबंध था। अप्रत्यक्ष रूप से वह पार्टी अपने लोगो को संदेश दे चुकी थी कि अगर उनके कार्यालय में छेदा टोपी और बकरा दाढी रखने वाले मुसलमान आकर बैठेगे और चुनाव प्रचार में हिस्सेदारी करेंगे तो फिर हिन्दू आबादी नाराज हो जायेगी, हिन्दुओं के वोट से हाथ धोना पड जायेगा? गुजरात हिन्दुत्व का प्रयोगशाला रहा है। वह पार्टी गुजरात में भाजपा को हराने के काफी करीब तक पहुच चुकी थी। लोकसभा के चुनाव में स्थितियां कुछ ऐसी ही है। कांग्रेस के प्रत्याशी गुलाम नवी आजाद को प्रचार में बुलाने से कतराते हैं और उन्हें हार का डर लग जाता है। अन्य तथाकथित सेक्युलर पार्टियां भी अपने दफतरों में मजहबी मुसलमानों की सक्रियता को रोकने और प्रतिबंधित करने का कार्य कर रही हैं। अब सोच पूरी तरह से बदल चुकी है। कांग्रेस और अन्य सेक्युलर राजनीतिक पार्टियों की सोच भी यह है कि भाजपा की डर से ये जायेंगे कहां, वोट तो उन्हें ही देंगे, फिर इनके पीछे लगना क्यों? इन्हें सम्मान देकर खुद का सर्वनाश क्यों कराया जाये।
भारतीय लोकतंत्र में ऐसी परिस्थतियां अस्वीकार हैं। पर विखंडन की प्रक्रिया मुस्लिम आबादी रोकती कहां है, हर गैर इस्लामी देश में अलग इस्लामिक देश चाहिए, बहुसंख्यक आबादी के खिलाफ हिंसा और आंतकवाद इनके लिए अनिवार्य है। इसी का प्रकटिकरण अमेरिका में डोनाल्ट ट्रम्प तो फिर रूस में  पुतिन और भारत में नरेन्द्र मोदी हैं। मुस्लिम आबादी को बहुसंख्यक आबादी के साथ मिलकर रहना सिखना होगा। हिन्दुओं की भावनाओं को आहत करने या फिर हर बात पर हिन्दुओं के खिलाफ फतवा जारी करने की राजनीति भी बंद होनी चाहिए। आतंकवाद और  सांप्रदायिकता की आग लगाने वाले मुस्लिम नेताओं के प्रति मुस्लिम आबादी की नजरियां भी बदलनी चाहिए। तथाकथित सेक्युलर राजनीतिक पार्टियों के प्रति भी इन्हें सजग रहने की जरूरत है। राष्ट्र की अवधारणा और राष्ट्र की अस्मिता को खारिज करने वाला कोई समूह अपने लिए सकारात्मक राजनीतिक स्थितियां नहीं बना सकता है?       
              विष्णुगुप्त
                                                                                                                                  

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