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हिंदी पट्टी पर एंटी इंकम्बेंसी का पलड़ा भारी

 भारतीय जनता पार्टी को उसके चाल, चरित्र और चेहरे के चलते पार्टी विथ डिफरेंस का तमगा दिया जाता रहा है और आज यही पार्टी कांग्रेस के नक्शे कदम पर चलने को मजबूर है। सत्ता के बाहर और सत्ता के अंदर दो मुंही बातों का पर्दाफाश होने से जन मानस हैरान और परेशान है। जिन बुनियादी मूल्यों और जन सुविधाओं के लिए पार्टी विथ डिफरेंस का दावा करने वाली पार्टी सडकों पर घमासान करती थी आज हालत उससे भी बदतर है, पार्टी में एक अजीब सी चुभने वाली चुप्पी छाई हुई है। दरी और पोस्टर चिपकाकर पार्टी का झंडा उठाने वाले कार्यकर्त्ा तो कब के नदारद हो चुके है और जो कुछ कैडर बचा है उसे धराशाही करने में मंत्रियों और सत्तासीनों की फौज जुटी है। कांग्रेस कल्चर अख्तियार कर चुकी पार्टी में जमीनी कार्यकर्त्ता बेहाल है। भ्रष्टाचार और लालफीताशाही का खेल खुलकर खेला जा रहा है। नरेंद्र मोदी ने अच्छे दिनों का वादा कर देश की बागडोर संभाली थी।  एक बारगी लगा देश में खुशहाली के गीत गाये जाने लगेंगे मगर पहले नोटबंदी,जीएसटी और बाद में पेट्रोल डीजल के आसमान छूते भावों ने गरीबों और आम आदमी की रसोई में आग लगाते  देर नहीं की। अच्छे उद्देश्यों के दावों को लेकर शुरू की गई योजनाओं को पलीता लगते देर नहीं लगी। इसमें कहाँ क्या कमी रह गई यह आज भी शोध का विषय है अथवा विपक्षी दलों के इस आरोप  में सत्यता खोजनी होगी की क्या ये कदम कुछ लोगों के काले धन को सफेद करने के लिए शुरू किये गए थे। बहरहाल यह मानने में कोई दिक्कत नहीं है कि जन कल्याण की कई योजनाएं शुरू हुई और आम आदमी को इससे फायदा भी हुआ मगर फायदे के साथ जो नुकसान हुआ वह भारी पड़ रहा है। गोरक्षा के नाम पर तांडव या भीड़तंत्र द्वारा कानून को अपने हाथ में लेने की घटनाएं निश्चय ही निंदनीय है। महंगाई के लिए सडकों पर धरना प्रदर्शन करने वाली पार्टी के कार्यकर्त्ा आज मुंह छिपाते घूम रहे है। रही सही कसर एससी एसटी एक्ट ने निकाल कर रख दी है। सदियों से दबे कुचले लोगों के उत्थान के लिए शुरू की गई इन योजनाओं का लाभ एक वर्ग विशेष तक सीमित हो कर रह जाने से अन्य वर्गों के गरीब परिवारों में चिंगारी उठना लाजमी है। सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय को वोटों के लालच में सभी पार्टियों ने गिरवी रख दिया इससे समाज में बेचैनी फैलना स्वाभाविक है। यदि इसका कोई सर्वसम्मत हल सभी लोग मिल बैठ कर निकालते तो यह बेहतर होता। स्वर्ण वर्ग के आर्थिक दृष्टि से कमजोर परिवारों पर मलहम लगाना समय की जरूरत और प्रासंगिक है। देश की सुप्रीम अदालत के फैसले के सन्दर्भ में अनुसूचित जाति, जन जाति के कथित झंडाबरदारों को अपनी सोच व्यापक रखनी होगी साथ ही एक्ट का दुरूपयोग रोकने के सार्थक प्रयास को अमलीजामा पहनना होगा तभी समाज में एकता और भाईचारे की नीवं मजबूत होगी।
देश की हिंदी पट्टी के तीन राज्यों में इस साल विधानसभा चुनाव का डंका बज चुका है। राजनीतिक दलों ने चुनावी चक्रव्यूह की रचना शुरू करदी है। एक दूसरे को पछाड़ने के नित नए दांव लगाए जा रहे है। यात्रायें और रैलियां निकाली जारही है। आरोपों और प्रत्यारोपों की झड़ी लग गई है। मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में भाजपा 15 सालों से और राजस्थान में पांच साल से निर्विघ्न राज कर रही है। भाजपा अपने राज की उपलब्धियों का बखान कर रही  है तो कांग्रेस विफलताओं और कुशासन की जानकारी दे रही है। हिंदी पट्टी के इन तीनों राज्यों में दोनों राष्ट्रीय पार्टियां सीधे मुकाबले में है। सर्वे पर सर्वे किये जाकर अपनी अपनी जीत के दावे किये जा रहे है। इन दोनों के बीच एंटी इंकम्बेंसी का पलड़ा भारी देखा जा रहा है। जनता जनार्दन सदा की भांति अपने दुःख दर्दों की झोली फैलाकर खड़ी है जिसे भुनाने के लिये नेता लार टपका रहे है। खबरियां चैनल परिवर्तन की बयार बहने की रट लगाए हुए है। जन मानस भी आक्रोशित है। देखना यह है कि हिंदी पट्टी भाजपा का साथ देती है या किनारे लगाती है। यही हिंदी पट्टी अगले वर्ष मोदी की ताजपोशी का फैसला सुनाएगी ऐसा लोगों का मानना है।  बहरहाल इस समय सत्तारूढ़ पार्टी के लिए कोई अच्छा सुकून दिखाई नहीं दे रहा है।   

- बाल मुकुन्द ओझा
वरिष्ठ लेखक एवं पत्रकार 

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