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विकल्प के अभाव से आस

भाजपा व जदयू से लेकर कांग्रेस तक के लिये चुनावी रणनीतियां तय कर चुके प्रशांत किशोर की संस्था द्वारा कराए गए सर्वे में प्रधानमंत्री पद के लिये देश के 48 फीसदी लोगों की पसंद के रूप में नरेन्द्र मोदी का उभरना शायद ही किसी के लिये आश्चर्यजनक हो। कुल 712 जिलों के 57 लाख लोगों के बीच किये गये इस सर्वे का नतीजा अगर वाकई किसी आयाम में चैंकाता है तो वह विपक्ष को लेकर आम लोगों की सोच ही है। जिस तरह से विपक्ष की ओर से मोदी के खिलाफ कोई एक ठोस विकल्प प्रस्तुत नहीं किया जा रहा है उसी तर्ज पर मतदाता भी किसी को मोदी के विकल्प के तौर पर उभरता हुआ नहीं देख रहे हैं। तभी प्रधानमंत्री पद पर दावेदारी की योजना बना रहे तमाम गैर-भाजपाई दलों में से किसी भी पार्टी के नेता को दहाई फीसदी लोगों से भी इस पद के लिये अपनी पसंद नहीं माना है। हालांकि राहुल गांधी को अवश्य 11 फीसदी लोग मोदी के विकल्प के तौर पर देख रहे हैं लेकिन उनके और मोदी के बीच जनस्वीकार्यता का जो बड़ा फासला उभर कर सामने आया है उसे देखते हुए मोदी ब्रांड को टक्कर दे पाने की हैसियत में आना राहुल के लिये अभी तो संभव नहीं दिख रहा है। लेकिन बड़ा सवाल है कि क्या सिर्फ प्रधानमंत्री पद के लिये पहली पसंद के तौर पर मोदी का उभरना ही भाजपा के लिये जीत की गारंटी है? सच तो यह है कि भाजपा के मोदी ब्रांड की स्वीकार्यता को अगर भारपा की स्वीकार्यता के साथ तुलनात्मक तौर पर देखें तो भाजपा को लेकर वैसी स्वीकार्यता जमीनी स्तर पर नहीं दिख रही है। वर्ना ऐसा कैसे हो सकता था कि बीते दिनों जिस कर्नाटक में महज आधे दर्जन सीटों की कमी के कारण भाजपा को बहुमत से दूर रह जाना पड़ा वहां के स्थानीय निकाय के चुनावों में उसे ना सिर्फ कांग्रेस ने पटखनी दे दी है बल्कि कांग्रसे और जदएस ने अलग-अलग लड़कर भी भाजपा के मुकाबले तकरीबने डेढ़ गुना अधिक सीटों पर कब्जा जमा लिया है। कल्पना की जा सकती है कि अगर इन दोनों दलों ने भाजपा के खिलाफ गठजोड़ कर लिया होता तो भगवा खेमे को इससे भी अधिक शर्मनाक स्थिति का सामना करना पड़ सकता था। यानि कर्नाटक के स्थानीय निकायों के चुनावी नतीजों ने इतना तो बता ही दिया है कि दक्षिण में भाजपा की स्वीकार्यता नहीं बन पाई है। इसी प्रकार की स्थिति बिहार में भी है जहां राजद के साथ मिलकर चुनाव जीतने के बाद नीतीश ने राजग का दामन थाम कर आम मतदाताओं के बीच राजद के लिये सहानुभूति की लहर पैदा कर दी है जिसके कारण बीते दिनों के उपचुनावों ने यह स्पष्ट संकेत दे दिया है कि बिहार में लालू राज की वापसी को टालना बेहद मुश्किल है। यानि भाजपा के लिये बिहार में स्वीकार्यता का अभाव ही दिख रहा है। यूपी में भी महागठजोड़ के समक्ष भाजपा कहीं से टिकती हुई नहीं दिख रही है। शायद यही वजह है कि सरकारी व संवैधानिक संस्थाओं का इस्तेमाल करके यह सुनिश्चित करने का प्रयास हो रहा है किसी भी तरह से वहां महागठजोड़ की स्थिति को टाला जा सके। ये सब तो दलगत राजनीति की बातें हैं जिन्हें छोड़ भी दें तो भाजपा की स्थिति आम मतदाताओं के बीच दिनों-दिन कमजोर ही होती दिख रही है। इसके बावजूद अगर मोदी सरकार तमाम ऊटपटांग और आत्मघाती फैसले करने से नहीं हिचक रही है तो इसकी इकलौती वजह वही है जिसकी तस्वीर प्रशांत किशोर के सर्वे में उभर कर सामने आई है। यानि भाजपा को इस बात का पूरा इत्मिनान है कि प्रधानमंत्री पद के लिये मतदाताओं की पसंद के रूप में मोदी के मुकाबले किसी अन्य का खड़ा नहीं हो पाना उसके लिये ही सत्ता का दरवाजा दोबारा खोलेगी। खतरा तो तब होता जब जनता के समक्ष कोई अन्य विकल्प उपलब्ध होता। लेकिन जब कोई विकल्प ही नहीं है तो फिर डर किस बात का। तभी तो कालीदास की तरह उसी डाल को काटने से भी सरकार संकोच नहीं कर रही है जिसके दम पर वह इतनी ऊंचाई पर बैठी हुई है। मसलन एससी-एसटी उत्पीड़न कानून के दुरूपयोग से आहत होकर सर्वोच्च न्यायालय द्वारा इसमें जो ढ़ील दी गई थी उसे सरकार ने तत्काल संसद में हासिल बहुमत के दम पर दोबारा मजबूती से दुरूस्त कर दिया। यह जानते हुए भी कि इस कानून की सीधी मार उसी वर्ग पर पड़ती है जो भाजपा का परंपरागत मतदाता है। यानि अपने परंपरागत मतदाताओं के हितों को ठेंगा दिखाने में सरकार को एक बार भी हिचक नहीं हुई तो इसकी इकलौती वजह इन लोगों के पास कोई दूसरा राजनीतिक विकल्प उपलब्ध नहीं होना ही है। इसी प्रकार भाजपा के तमाम कोर मुद्दों को ठंडे बस्ते में डालने की जो नीति अपनाई गई है और जिन मसलों को आगे रखकर भाजपा ने राजनीतिक परिदृश्य में अपनी अलग छवि गढ़ी थी उससे किनारा करने में भी सरकार संकोच नहीं कर रही है। मसलन राम मंदिर के मुद्दे पर सरकार ने कुछ भी पहल करने से साफ इनकार कर दिया और अब जो होगा वह कोर्ट के आदेश से ही होगा। समान नागरिक संहिता को विधि आयोग ने ही अस्वीकार्य बता दिया है। गौ-हत्या बंदी करने से सरकार यह कहकर इनकार कर चुकी है कि इससे भारत की विविधता की तस्वीर को नुकसान होगा और जम्मू-कश्मीर को विशेष दर्जा देने वाले संविधान के अनुच्छेद 35-ए पर सर्वोच्च न्यायालय में सुनवाई को स्थानीय चुनावों की दलील देकर अगले साल की जनवरी माह के दूसरे पखवाड़े तक के लिये टलवा दिया गया है। इसी प्रकार व्यापारियों व बनियों की पार्टी कहलाने वाली भाजपा की सरकार ने ही आॅनलाईन बाजार व खुदरा कारोबार को सर्वव्यापी बना दिया है जिसके कारण छोटे दुकानदारों के समक्ष रोजी-रोटी का संकट उत्पन्न होने लगा है। यह सब करने की हिम्मत सरकार को जनता की विकल्पहीनता ही तो दे रही है। वर्ना कोई भी दल अपने मूल सिद्धांतों से और परंपरागत मतदाताओं से इस कदर सीना ठोंककर कैसे अपना पल्ला झाड़ सकता है। लेकिन इस कदर मनमानी नीतियों का अनुसरण किया जाना जनता को कितना स्वीकार्य होगा यह वक्त के साथ ही पता चलेगा। मगर विकल्पनहीनता को ही रामबाण मान कर चलना भाजपा संगठन और मोदी सरकार के लिये आत्मघाती साबित हो सकता है। वैसे भी राजनीति में निर्वात के लिये कोई जगह नहीं होता है और अगर मतदाता बदलाव करने पर आमादा हो जाएं तो नए विकल्प को उभरने में देर भी नहीं लगती है। इसका मुजाहिरा दिल्ली में पहले ही हो चुका है जहां भाजपा और कांग्रेस के चूहे-बिल्ली के खेल से तंग आकर मतदाताओं ने इन दोनों को खारिज करते हुए उस नए-नवेले आप को 70 में से 67 सीटों पर जीत दिला दी जिसकी कुछ माह पूर्व तक पैदाइश भी नहीं हुई थी। लिहाजा मतदाताओं के सब्र से खिलवाड़ करने वालों को यह नहीं भूलना चाहिये कि जो दिल्ली में हो सकता है वैसा ही कोई चमत्कार कभी भी और किसी भी स्तर पर हो सकता है। 

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