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अब तो अपने को सुधार लो हिन्दी वाले गुरुजी


क्या कभी आपने सोचा कि हिन्दी के स्कूल  का अध्यापक इतना दीन-हीन सा क्यों नजर आता है? उसे लगता है कविताएं,दोहे और निबंध पढ़ाकर वो बहुत महान कार्य कर रहा है।  उसने शायद उसने सोचा भी नहीं होगा कि उसे अपने में समय के साथ ज़रूरी बदलाव भी करने होंगे। उसे अपने को कुशल अध्यापक के रूप में सिद्ध करना होगा। उसे हिन्दी को विषय के रूप में ही नहीं, बल्कि इस तरह से पढ़ाना होगा ताकि उसके छात्र-छात्राएं हिन्दी के माध्यम  से रोटी-रोजी कमा सकेँ। प्राय: हिन्दी प्रदेशों के मास्टरजी सोच बैठे हैं कि उन्हें तो अपनी क्लास भर लेनी है। 40-45 मिनट की क्लास भर लेकर निकल लेना है। यह मानसिकता हिन्दी अध्यापक को छोड़नी ही होगी।
दऱअसल इस साल उत्तर प्रदेश की 10 वीं की हाई स्कूल और 12 वीं की इंटर की परीक्षाओं के परिणामों में विद्यार्थियों का हिन्दी का परिणाम बेहद आंखें खोलने वाला रहा। इन परीक्षाओं में लाखों विद्यार्थी  राष्ट्रभाषा हिन्दी में फ़ेल  हुए। यकीन मानिए कि करीब 11 लाख से अधिक हाई स्कूल और इंटर के विद्यार्थी अपनी हिन्दी की परीक्षाओं में उतीर्ण नहीं हो सके।  उत्तर प्रदेश में हिन्दी अनिवार्य विषय के रूप में पढ़ाया जाता है। निश्चित रूप से यह आंकड़ा तो बहुत बड़ा है। पिछले वर्ष भी  लगभग साढ़े सात लाख हाई स्कूल और इंटर के छात्र हिन्दी की परीक्षा में फेल हुए थे। जब यह हाल है हिन्दी की  हृदयस्थली में यह हालत है तो बाक़ी प्रदेशों का भी इससे बेहतर क्या होगा।
ये नतीजे यही सिद्ध कर रहे हैं कि प्रदेशों को चाहिए योग्य और कुशल हिन्दी के शिक्षक। हमारे यहां बड़ी तादाद में निकम्मे शिक्षक भी हैं जिन्हें राजनीतिक और जातीय आधारों पर नियुक्त कर लिया गया। इन्हें मालूम है, चूंकि इनकी नौकरी सुरक्षित है, इसलिए ये मौज करते रहते हैं। उन्हें समझना होगा कि उनके नीरस अध्यापन के कारण ही बच्चे हिन्दी से कन्नी काट रहे हैं। अब यह उपाय ही बचा है कि निकम्मे अध्यापकों पर चाबुक चले।
क्या हिन्दी के ये मास्टरजी रोनाल्ड स्टुर्ट मेक्ग्रेगर से परिचित हैं? मेक्ग्रेगर ने 1964 से लेकर 1997 तक कैम्बिज विश्वविद्यालय  में हिन्दी पढ़ाई। वे चोटी के भाषा विज्ञानी,व्याकरण के विद्वान, अनुवादक और हिन्दी साहित्य के इतिहासकार थे। क्या हमारे हिन्दी के गुरुजनों ने रूस के हिन्दी विद्वान और अध्यापक पीटर वारान्निकोव  का नाम सुना है? वारान्निकोव ने रामायण का रूसी भाषा में अनुवाद किया है।  उऩ्होंने  मास्कोविश्वविद्यालय में हिंदी भी पढ़ाई। वारान्निकोव हिंदी अखबारों के लिए समय-समय पर लेख भी लिखते थे। उऩके पिता भी हिन्दी के विद्वान थे। उन्हीं से पीटर ने हिन्दी सीखी। उसके बाद उन्होंने संस्कृत का भी कायदे से गहन अध्ययन किया। वे 70 के दशक में राजधानी केसोवियत सूचना केन्द्र से जुड़े थे। जापान के आकियोहागा जापानी और हिन्दी भाषा के विद्वान हैं। भारत उनके मन में बचपन से ही कौतहूल पैदा करता था। भारत से बौद्ध धर्म के संबंधों के चलते भीहागा भारत से प्रभावित रहते थे। उन्होंने टोक्यो यूनिर्विसिटी से हिन्दी में एम.ए करने के बाद हिन्दी अध्यापन की दुनिया में कदम रखा।  वे जापान में हिन्दी के प्रचार-प्रसार के लिए जुड़े हुए हैं। अपने देश के हिन्दी शिक्षकों, खासतौर पर हिन्दी पट्टी, को इन विदेशी हिन्दी शिक्षकों के बारे में बताए जाने की आवश्यकता है। इन्होंने एक विदेशी भाषा के प्रसार-प्रचार में महान योगदान दिया है। हमारे हिन्दी के शिक्षकों को इन विदेशियों से प्रेरित होना चाहिए। इन्हें भी अपने छात्र-छात्राओं को इस तरह से पढ़ाना चाहिए ताकि अगर ये स्तरीय हिन्दी लिख-बोल सकें। अभी ये नहीं हो पा रहा है।

निश्चित रूप से स्कूलों से लेकर कॉलेजों के हिन्दी अध्यापकों को ये जानना होगा कि अब हिन्दी रोजगार की भाषा बन चुकी है। हिन्दी का स्तरीय ज्ञान उनके शिष्यों के उज्जवल भविषय की कुंजी है। इसलिए उन्हें अपने अध्यापन के तरीके को और बेहतर बनाना ही होगा।

करते हिन्दी की राजनीति

यहां पर ये भी मानना होगा कि किसी भी समाज,वर्ग या प्रदेश पर कोई अन्य भाषा थोपना गलत है। ये निंदनीय है। इसी तरह से किसी भाषा का अपमान या अनादर राजनीतिक लाभ या स्वार्थ के भी करना उचित नहीं माना जा सकता है। क्या ये हिन्दी ने अपराध कर दिया कि वो देश की  सबसे बड़ी बोली और समझी जाने वाली भाषा है? संभवत: कुछ  तत्वों को ये तथ्य बुरा लगता है। पूर्वोत्तर के राज्य मेघालय और कर्नाटक में कुछ माह पूर्व हिन्दी का अकारण विरोध देखने में आया। इन दोनों प्रदेशों में हिन्दी, वहां की स्थानीय जनता पर थोपी नहीं जा रही थी।  इसका पहला उदाहरण लीजिए। चालू वर्ष के शुरू में मेघालय के राज्यपाल गंगा प्रसाद ने राज्य विधान सभा के बजट सत्र में अपना भाषण में हिन्दी दिया। उनके हिन्दी में भाषण देने पर कांग्रेस के सदस्यों ने तगड़ा बवाल काटा। उन्होंने आरोप लगया कि राज्यपाल ने हिन्दी में भाषण देकर एक गलत परम्परा की शुरूआत की है। क्या मेघालय विधानसभा में अंग्रेजी में भाषण दिया जाना बहुत महान परम्परा माना जाए? क्या हिन्दी में भाषण का विरोध करने वाले अंग्रेजी के बहुत बड़े ज्ञानी हैं? क्या हिन्दी भारत की भाषा नहीं है? हिन्दी विरोधियों को इन प्रश्नों के उत्तर देने होंगे। अगर बात मेघालय और पूर्वोत्तर भारत में हिन्दी की स्थिति की हो तो वहां भी दशकों से अनेक संस्थाएं हिन्दी की सेवा में जुटी हैं।

गांधी, हिन्दी पूर्वोत्तर भारत

मिज़ोरम में ‘मिज़ोरम हिन्दी प्रचार सभा’ लंबे समय से स्थानीय लोगों के लिए हिन्दी की कक्षाएं आयोजित कर रही है। पूर्वोत्तर भारत में हिन्दी अब पैर जमा चुकी है। इस समूचे क्षेत्र में हिन्दी को लेकर जाने का श्रेय मारवाड़ी व्यापारियों और उत्तर प्रदेश तथा बिहार से काम के सिलसिले में गए मजदूरों को भी जाता है। देश के पूर्वोत्तर भागों में हिन्दी को स्थापित करने में गांधी जी के योगदान को कौन भूला सकता है? उन्होंने पूर्वोत्तर भारत के वृहत्तर समाज को हिन्दी से परिचित कराने के लिए बाबा राघवदास को  असम भेजा था। पूर्वोत्तर में हिन्दी इसलिए भी आराम से स्थापित हो गई, क्योंकि जिन भाषाओं की लिपि देवनागरी है, वह भाषा हिन्दी न होते हुए भी उस भाषा के जरिए हिन्दी का प्रचार हो जाता है। जैसे कि अरूणाचल में मोनपा, मिशि और अका, असम में मिरि, मिसमि और बोड़ो, नगालैंड में अडागी, सेमा तथा  सिक्किम में नेपाली लेपचा, भड़पाली, लिम्बू आदि भाषाओं के लिए देवनागरी लिपि है। देवनागरी लिपि अधिकांश भारतीय लिपियों की मां रही है|
मेघालय की ही तर्ज पर कर्नाटक में अपने मुख्यमंत्रित्वकाल में सिद्धरमैय्या ने हिन्दी का  विरोध किया। उनके ‘आशीर्वाद’ से बेंगलुरु मेट्रो स्टेशनों पर हिंदी में लिखे गए नामों पर कालिख पोती गई। ये सारी हरकत कर्नाटक रक्षणा वेदिके (केआरवी) नाम के संगठन के लफंगे कर रहे थे। ये बेंगलुरु मेट्रो के सभी स्टेशनों से हिन्दी साइन बोर्ड को हटाने की मांग कर रहे थे। क्या मेघालय में खासी या कर्नाटक में कन्नड़ भाषा की अनदेखी की गई? नहीं, तो फिर इनमें हिन्दी का विरोध क्यों हुआ? दक्षिण भारत में हिन्दी की सेवा करने में कर्नाटक का स्वर्णिम इतिहास रहा है। वहां 1939 से कर्नाटक हिन्दी प्रचार समिति सक्रिय है।1943 में मैसूर हिंदी प्रचार परिषद तथा 1953 में कर्नाटक महिला हिन्दी सेवा समिति की स्थापना हो गई थी। ये कर्नाटक में हिन्दी के प्रसार-प्रचार में लगी हैं। मुझे मेरे एक मित्र बता रहे थे राजधानी के लोधी एस्टेट में स्थित कन्नड़ स्कूल में हिन्दी विषय पढ़ाने वाले अधिकतर अध्यापक मूल रूप से कन्नड़ भाषी रहे हैं। ये छोटी बात नहीं है कि उत्तर भारत के किसी स्कूल का हिन्दी विषय का अद्यापक कन्नड़भाषी हो। पर ये हो रहा है। इसी तरह से राजधानी के सभी सात तमिल स्लों में अधिकतर हिन्दी के अध्यापक मूल रूप से तमिल भाषी है। पर कुछ लोगों को तो राजनीति करनी है। उका आप कुछ नहीं कर सकते।
दरअसल अपने देश में भाषा का प्रशन  सुलझ चुका है। देश अपनी सभी भाषाओं का आदर सम्मान कर  रहा है। कहीं कोई किसी पर भाषा नहीं थोपी जा रही।  सभी भारतीय एक-दूसरे की मातृभाषाओं का सम्मान कर रहे हैं। तो फिर हिन्दी का अचानक विरोध क्यों होने लगता है? हिन्दी का विरोध करने वालों को समझना होगा कि प्रेम और सौहार्द की भाषा हिन्दी इस देश के करोड़ों लोगों की मातृभाषा है। ये उनके दिलों में बसती है।

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