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आखिर क्या हैं एनआरसी की नुक्ताचीनी के मायने, किनको है छटपटाहट और क्यों, इसे समझिए


असम में राष्ट्रीय जनसंख्या रजिस्टर (एनआरसी) का दूसरा और अंतिम मसौदा जारी होने और उसमें तकरीबन 40 लाख लोगों को अवैध नागरिक के रूप में चिन्हित किए जाने से भारतीय राजनीति एक बार फिर उबाल खाने लगी है। पक्ष और विपक्ष की सियासत ने सड़क से संसद तक कोहराम मचा रखा है। उनके परस्पर घाती-प्रतिघाती तीर से हमारी राष्ट्रीय संवेदनाएं इस कदर बिंध रही हैं कि उनकी वैचारिक मरहम-पट्टी के क्रम में सवाल दर सवाल तो उठ रहे हैं, लेकिन जवाब नदारत। आखिर ऐसा क्यों, किसके लिए और कब तक?
सवाल है कि जब दुनिया के अधिकांश देश अप्रवासियों और घुसपैठियों को अपना असह्य बोझ समझते आए हैं और उन्हें  जनसमस्या विस्तारक ठहराते हुए एक सीमा से अधिक बर्दाश्त करने के पक्षधर कदापि नहीं रहे हैं, तो फिर भारत ऐसा क्यों, कब तक और किसके लिए करे? यदि यह छोटी सी बात भारत के कुछेक राजनैतिक दल समझ जाते, तो फिर राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर सम्बन्धी कतिपय त्रुटियों पर उतना बावेला नहीं मचाते जितना कि हमारी सड़क और संसद गवाह बन चुकी है। 
दरअसल, बंगलादेशी घुसपैठियों के सवाल पर जिस तरह से भारतीय राजनैतिक दल आपस में ही विभाजित नजर आ रहे हैं और दूरगामी राष्ट्रीय हितों से इतर अपने-अपने साम्प्रदायिक और प्रांतीय (भाषाई) नजरिए से इसे तूल देते हुए अपनी-अपनी जली-कटी राजनैतिक रोटियां सेंक रहे हैं, वह कोई स्वस्थ सियासी परम्परा नहीं है। सच कहा जाए तो भारत में एक अरसे से सुलगते बंगलादेशी घुसपैठिए के सवाल को लेकर जो क्षुद्र राजनीति अपने चरम पर है, वह किसी भी दृष्टि से उचित नहीं है। 
अमूमन, यह दलगत लोकतांत्रिक मर्यादा और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का दुरुपयोग तो है ही, साथ ही साथ कतिपय महत्वपूर्ण राष्ट्रीय हितों के साथ किसी अनर्गल खिलवाड़ से कम भी नहीं है। यह स्थिति राष्ट्रीय चिंता पैदा करने के साथ-साथ कई अनसुलझे सवाल भी खड़े करती है। इसलिए ऐसे लोगों की पहचान सुनिश्चित करना और उन्हें सकुशल उनके देश वापस भेजने की व्यवस्था करना किसी भी लोकतांत्रिक सरकार का मौलिक कर्तव्य है और दायित्व भी। क्योंकि ऐसे लोगों का नाता पड़ोस से ही होता है।
देखा जाए तो जहां अमेरिका और इजरायल जैसे देश अपने-अपने देश से घुसपैठियों को बाहर करने में सफल रहे हैं, वहीं  इटली और भारत जैसे देश मानवीय रूप से संवेदनशील इस प्रक्रिया को अंजाम देने के क्रम में भारी जद्दोजहद से गुजर रहे हैं। ख़ासकर भारत में यह मुद्दा इतना जटिल हो चुका है कि पक्ष-विपक्ष की अदूरदर्शी राजनीति के चलते नागरिक और पुलिस प्रशासन के हाथ-पांव भी फूलने लगे हैं। 
स्वाभाविक सवाल है कि किसी भी लोकतांत्रिक देश में जब सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों ही बहुमत के चक्कर में राष्ट्रीय महत्व के मुद्दों से खेलें और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता तथा सत्ता प्राप्ति का खुल्लमखुल्ला दुरुपयोग करें तो फिर किसी भी प्रशासन या न्यायपालिका के लिए विवेकसम्मत तरीके से कार्य करना और निष्पक्ष निर्णय लेना थोड़ा मुश्किल हो जाता है। ऐसा करने के लिए उन्हें कई परेशानियों से भी दो-चार होना पड़ता है। 
इस बात में कोई दो राय नहीं कि असम में राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर के घोषित अद्यतन मसौदे के आलोक में भारतीय नागरिकता से वंचित रह जाने वाले असम के लगभग 40 लाख बंगलादेशी घुसपैठियों के सवाल पर जो तल्ख और अदूरदर्शी  सियासत हो रही है, वह राष्ट्रीय हित के नजरिए से एक गम्भीर और अतिसंवेदनशील मामला है। लिहाजा, सियासी दलों से अपेक्षा है कि वे असम में एनआरसी से जुड़े मामलेे को हिन्दू और मुसलमान या असमी और बंगाली के नजरिए से नहीं देखें, बल्कि विदेशी घुसपैठिए के लिहाज से देखें और उनके प्रति कड़े तेवर अख्तियार करें। बेशक, यह राष्ट्रीय हित का मामला है और इस पर दलगत राजनीति से दूर रहते हुए सर्वदलीय सहमति विकसित की जानी चाहिए और स्थानीय प्रशासन को विवेकसम्मत कार्रवाई करने की खुली छूट देनी चाहिए। 
मसलन, राजनेताओं को यह नहीं भूलना चाहिए कि वर्ष 2014 में इस मामले में सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप के बाद उसकी निगरानी में ही एनआरसी का मसौदा तैयार हो रहा है जो पूरी तरह से पारदर्शी और निष्पक्ष है। इसे अपडेट और प्रकाशित करने की समय सीमा भी सुप्रीम कोर्ट ने ही तय कर रखी है जिसके मुताबिक नया मसौदा जारी किया गया है। ताजा मसौदे से यह स्पष्ट हो चुका है कि 2, 89, 38, 677 नागरिक ही वैध हैं जिनकी नागरिकता की पुष्टि हो चुकी है, जबकि 40, 52, 703 लोग एनआरसी से बाहर हैं। 
हालांकि जिनका नाम इसमें शामिल नहीं है, ऐसे लोगों को भी घबराने की जरूरत नहीं है, क्योंकि उन्हें अपनी भारतीय नागरिकता साबित करने का मौका मिलेगा। उन्हें यह पता होना चाहिए कि यह एक मसौदा भर है, अंतिम सूची नहीं है। इसलिए हर किसी को कानून में किए गए प्रावधानों के तहत इस पर अपने दावे और आपत्तियां दर्ज करने का पूरा मौका मिलेगा। इन दावों और आपत्तियों को निपटाने के बाद ही एनआरसी की अंतिम सूची प्रकाशित की जाएगी। इसके बाद भी लोगों को दावों को लेकर विदेशी नागरिक न्यायाधिकरण में जाने का मौका मिलेगा। सरकार ने साफ कर दिया है कि किसी के खिलाफ प्रतिशोध की कार्रवाई नहीं की जाएगी। दरअसल, एनआरसी की प्रक्रिया आवेदन पर आधारित है और कोई भी व्यक्ति, चाहे वह कितना भी प्रतिष्ठित हो, अगर अर्जी नहीं दाखिल करता है तो सूची में उसका नाम नहीं होगा।
भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने राज्यसभा में राष्ट्रीय जनसंख्या रजिस्टर मसौदे (एनआरसी ड्राफ्ट) को जायज ठहराते हुए साफ कहा है कि घुसपैठियों की पहचान जरूरी थी, इसलिए यह ड्राफ्ट लागा गया है। दरअसल, घुसपैठियों की पहचान करने की हिम्मत आज तक किसी सरकार ने नहीं दिखाई, पर आज ऐसी सरकार है जो हिम्मत दिखाते हुए घुसपैठियों की पहचान कर रही है। यह कौन नहीं जानता कि एनआरसी तो कांग्रेस ही ले आई है, लेकिन उसे ईमानदारीपूर्वक लागू नहीं कर सकी। आखिर वह बांग्लादेशी घुसपैठियों को क्यों बचाना चाहती है?  
वहीं, बीजेपी के एक अन्य नेता ने एनआरसी का दायरा अन्य राज्यों में भी बढ़ाने और बांग्लादेशियों को देश से बाहर धकेलने की बातें करके अपने भावी इरादे स्पष्ट कर दिए। केंद्रीय स्वास्थ्य राज्यमंत्री अश्विनी चौबे ने दो टूक कहा कि एनआरसी को अब बिहार में भी शुरू करना चाहिए, क्योंकि जो भारत का नागरिक है सिर्फ उसी को इस देश में रहना चाहिए और अन्य घुसपैठिए को देश की सीमा से बाहर कर देना चाहिए। उन्होंने स्पष्ट कहा कि बांग्लादेशियों ने देश को बहुत ज्यादा प्रभावित करने का प्रयास किया है। इससे मुझे नहीं लगता कि अमित शाह ने राजीव गांधी के बयान को तोड़ने-मरोड़ने का प्रयास किया है। अतः कांग्रेस जो भी आरोप लगा रही है वो सरासर बेबुनियाद है। 
बताते चलें कि बांग्लादेशियों के देश में बे-रोकटोक घुसपैठ के कारण सीमावर्ती जिले मुस्लिम बहुल हो गए हैं और सम्बन्धित प्रांतों का जनसंख्या संतुलन बिगड़ गया है। एक दशक पहले भी असम के पूर्व राज्यपाल अजय सिंह ने केंद्र सरकार को सौंपी एक रिपोर्ट में स्पष्ट किया था कि हर दिन छह हजार बांग्लादेशी देश में घुसपैठ करते हैं। दूसरी तरफ संयुक्त राष्ट्र की एक तब की रिपोर्ट के मुताबिक, पिछली जनगणना में बांग्लादेश से एक करोड़ लोग गायब हैं। इन घुसपैठियों के चोरी, लूटपाट, डकैती, हथियार एवं पशु तस्करी, जाली नोट एवं नशीली दवाओं के कारोबार जैसी आपराधिक गतिविधियों में शामिल होने के कारण कानून व्यवस्था पर भी गंभीर खतरा पैदा हो गया है। इसके अलावा बांग्लादेशी घुसपैठ आतंकवादी संगठनों एवं पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आईएसआई की गतिविधियों के लिए एक हथियार के रूप में उभरकर देश की सुरक्षा के समक्ष खतरा पैदा कर रही है। 
बता दें कि अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (एबीवीपी) ने ऐसी आशंकाओं के बीच जनवरी 2007 में उत्तर पूर्व में असम, मेघालय, त्रिपुरा और मिजोरम से लगी बांग्लादेश की सीमा का एक अध्ययन शुरू किया था जिसमें सीमा की भौगोलिक वास्तविक स्थिति की जानकारी, सुरक्षा प्रबंध की स्थिति, सीमांत गांवों तथा वहां के लोगों की वास्तविक स्थिति, सीमा पर घुसपैठ और अवैध गतिविधियों तथा बांग्लादेशी घुसपैठियों की वजह से पैदा हुए जनसंख्या असंतुलन की जानकारी के बाद तैयार एक रिपोर्ट में यह दावा किया गया था कि सीमा से सटे राज्यों में घुसपैठियों की वजह से स्थिति गंभीर हो गई है। 
उन्हीं दिनों बिहार में आयोजित एक रैली के दौरान एबीवीपी ने इन घुसपैठियों के खिलाफ जंग का ऐलान करते हुए घुसपैठियों की पहचान और उनकी नागरिकता समाप्त करने के लिए स्वतंत्र टास्क फोर्स के गठन और चिकन नेक पट्टी को विशेष सुरक्षित क्षेत्र घोषित कर इसे सेना के हवाले करने की प्रधानमंत्री से मांग की। तब परिषद की मांगों में 1951 की भारतीय नागरिक पंजीयन के आधार पर बांग्लादेशी घुसपैठियों की पहचान कर उनका नाम मतदाता सूची से हटाने और उनकी नागरिकता समाप्त करने  तथा घुसपैठ संबंधी मामलों की त्वरित सुनवाई के लिए सभी राज्यों में त्वरित अदालतों का गठन करने की मांग भी शामिल थी। हालांकि तब परिषद ने आरोप लगाया था कि वोट बैंक की राजनीति के कारण सत्ता में बैठे कुछ लोग देश की एकता और अखंडता के साथ समझौता कर रहे हैं। लेकिन अब उनकी सरकार न केवल केंद्र में बल्कि अधिकांश राज्यों में है। इसलिए सरकार उनके एजेंडे को आगे बढ़ा रही है। लेकिन आज भी विपक्ष में रहते हुए कल के सत्ताधारी दल का जो रुख है, उससे परिषद के उपरोक्त आरोप सही प्रतीत हो रहे हैं? यह राष्ट्रीय हितों के साथ खिलवाड़ नहीं तो क्या है? 
गौरतलब है कि पूर्वोत्तर राज्यों को शेष भारत से जोड़ने वाले 32 किमी लंबे और 21 से 24 किमी चौडे़ सिलीगुड़ी कॉरिडोर, जिसे चिकन नेक पट्टी के नाम से जाना जाता है, के आसपास और अन्य जगहों पर भी परिषद ने घुसपैठ को रोकने के लिए भारत-बांग्लादेश सीमा को पूरी तरह सील करने, तारबंदी का काम जल्द से जल्द पूरा कर उसमें विद्युत प्रवाह की व्यवस्था करने, सीमावर्ती क्षेत्र में सभी मस्जिदों, मदरसों अन्य धार्मिक स्थलों तथा नए बसे गाँवों की जाँच करने और देश की सुरक्षा के लिए अवैध निर्माणों को हटाने तथा सीमा सुरक्षा बल को आधुनिक उपकरण हथियार और व्यापक अधिकार देने की भी माँग की है। याद दिला दें कि तत्कालीन केन्द्रीय गृह राज्यमंत्री श्रीप्रकाश जायसवाल ने भी डेढ़ करोड़ बांग्लादेशियों का घुसपैठ की बात स्वीकार की थी। इसके अलावा, वैध तरीके से वीजा लेकर आए करीब 15 लाख बांग्लादेशी भी देश में गायब हैं। छह मई 1997 को संसद में दिए एक बयान में तत्कालीन गृह राज्यमंत्री इंद्रजीत गुप्ता ने भी स्वीकार किया था कि देश में एक करोड़ बांग्लादेशी हैं। सवाल है कि जब यह मसला इतना पुराना है तो कार्रवाई में इतना विलम्ब क्यों किया गया? अब यदि असम में सत्तारूढ़ बीजेपी सरकार सक्रिय है तो विपक्ष उसके नेक प्रयासों में अड़ंगा क्यों डाल रहा है?
इस बात में कोई दो राय नहीं कि घुसपैठ आज देश की सबसे बड़ी समस्या बन चुकी है। आलम यह है कि बांग्लादेशी यहां अवैध रूप से राशन कार्ड और मतदाता पहचान-पत्र बनाकर कई विधानसभा और लोकसभा क्षेत्रों में निर्णायक की भूमिका निभा रहे हैं, जिससे देश की एकता और अखंडता के लिए गंभीर खतरा पैदा हो गया है। आरोप तो यहां तक लग चुका है कि वोट बैंक की राजनीति के कारण तथाकथित धर्मनिरपेक्ष राजनीतिक पार्टियां अब देश के मानचित्र को बदलने की साजिश का हथकंडा बनती जा रही हैं। तभी तो असम के अलावा, पश्चिम बंगाल के 52 विधानसभा क्षेत्रों में 80 लाख और बिहार के 35 विधानसभा क्षेत्रों में 20 लाख बांग्लादेशी घुसपैठिए रच-बस चुके हैं। तकरीबन 40 वर्षों से घुसपैठ विरोधी आंदोलन चला रहे परिषद का स्पष्ट कहना है कि ब्रिटेन पूर्वोत्तर क्षेत्र को मिनी इंग्लैंड बनाना चाहता हैं, वहीं चीन इस क्षेत्र पर अपना नियंत्रण स्थापित करना चाहता है जबकि बांग्लादेश यहाँ अपने प्रभाव का विस्तार कर इसे ग्रेटर बांग्लादेश बनाना चाहता है। 

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