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राहुल के सियासी एक्शन, इमोशन और ड्रामा से उभरते सवाल



कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने संसद में अविश्वास प्रस्ताव पर बोलते हुए जिस एक्शन, इमोशन और ड्रामा का सहारा लिया, वह काबिलेगौर है। काबिलेतारीफ इसलिए नहीं कहा जा सकता कि अपने साथियों को आंख मारकर और एक महिला सांसद द्वारा उन्हें देखकर मुस्कुराने की चर्चा सदन में सरेआम करके उन्होंने खुद ही अपनी मिट्टीपलीद कर ली, अन्यथा उनकी काफी प्रशंसा होती। क्योंकि उनके भाषणों में तथ्य और तेवर दोनों का सम्मिश्रण था। अब गोलबंद विपक्ष उन्हें अपना नेता माने या नहीं माने, लेकिन उन्होंने एकबार फिर साबित करने की कोशिश की कि विपक्षी पीएम मेटेरियल वहीं हैं।
निःसन्देह, अपने संबोधन में उन्होंने जिस तरह से गिने-चुने पूंजीपतियों पर निशाने साधे, बिना प्रमाण के रक्षा घोटालों की ओर कई एक इशारे किए, फ्रांसीसी राष्ट्रपति मैक्रोन को अपनी संसदीय चर्चा में घसीटा, विभिन्न जनसमस्याओं को मुखरतापूर्वक उठाया और पीएम के कई सुलगते जुमले गिनाए और दिलाजिज दोस्त बताए, इससे कतिपय अहम सवाल भी उभरे हैं। अब भले ही बहुत लोगों को यह किसी फिल्मी स्क्रिप्ट जैसा लगा हो, लेकिन विषयवार उनकी अलग-अलग भाव-भंगिमाओं ने यह जाहिर कर दिया कि जिस राजनैतिक परिपक्वता की अपेक्षा उनसे की जानी चाहिए, वह अब उनमें आ चुकी है। यदि कुछ कमियां शेष रह गई हैं जो दिखाई भी पड़ चुकी हैं तो वह वक्त के साथ दूर हो जाएंगी। 
दरअसल, जिस सियासी रार को समाप्त करने के नजरिए से यह अविश्वास प्रस्ताव लाया गया, उसमें बीजेपी और कांग्रेस दोनों ही अपनी-अपनी रणनीति के मुताबिक सफल दिखाई पड़ीं। जबकि छूटभैया दलों को इससे कोई विशेष माइलेज नहीं मिलने वाला। क्योंकि अविश्वास प्रस्ताव पर हुई बहस ने एक बार फिर से राहुल गांधी को मीडिया विमर्श और जनचर्चा के केंद्र में ला दिया है, जो मोदी सरकार के विरुद्ध शुरू से ही आक्रामक रहे हैं। 
कुछ ऐसे ही ज्वलन्त मुद्दों पर सियासी सान चढ़ाते हुए राहुल गांधी ने भी मोदी सरकार पर न केवल कई तंज कसे, बल्कि अपना भाषण समाप्त करने के बाद जिस नाटकीय अंदाज में पीएम मोदी से गले मिले (कुछ लोगों के नजरिए से गले पड़े), फिर मोदी ने उनकी पीठ थपथपाई और जब राहुल जाने लगे तो पीएम मोदी ने इशारे से बुलाकर पुनः हाथ मिलाया, उसे सिर्फ सियासी शिष्टाचार के नजरिए से देखना भारी भूल होगी। वास्तव में, इसके कई गहरे सियासी निहितार्थ हैं जो समय के साथ बनने वाले समीकरणों के साथ साथ स्पष्ट होते चले जाएंगे। 
दो टूक कहें तो राहुल का यह नया पैंतरा इस बात का द्योतक है कि भारतीय राजनीति में आरोप-प्रत्यारोप के तीर तो चलेंगे, लेकिन सियासी कटुता कभी भी अपनी हद से आगे नहीं बढ़ेगी और न ही बढ़ने दी जाएगी। यदि आपने गौर किया होगा तो देखा-सुना होगा कि राहुल गांधी, मोदी सरकार की आलोचनाओं के साथ-साथ उसके प्रति कृतज्ञता भी व्यक्त कर रहे थे। यह कोई सामान्य बात नहीं है, बल्कि एक साहसिक पहल है और पैनी सियासी समझ का परिचायक भी, जो उनमें आ चुकी है। निःसन्देह राजनैतिक शीर्ष पर पहुंचने की चाहत में श्री गांधी की ओर से की गई यह एक बहुत बड़ी कवायद है। 

अब सार्वजनिक तौर पर राहुल गांधी ने भी माना कि कांग्रेसी होने, शिव जी होने और हिन्दू होने का मतलब उन्हें संघ-बीजेपी ने ही सिखलाया है। इसलिए वह इन लोगों से नफरत नहीं करते हैं और न ही करेंगे। साथ ही, उन्होंने यह भी जोड़ा कि आपलोग भी मुझसे, मेरी पार्टी से नफरत नहीं करें। उन्होंने संकेत दिया कि मौका मिलने पर वह ऐसा सकारात्मक सियासी माहौल बनाएंगे कि बीजेपी के सभी लोग भी कांग्रेसी हो जाएं। उनके शब्दों में कहूं तो "मैं नफरत की राजनीति नहीं करता, मोहब्बत की राजनीति करता हूं। मैं आप सबको कांग्रेस में बदलूंगा।" 
इस बात में कोई दो राय नहीं कि राहुल गांधी के इस बयान से हिन्दू मतदाताओं के दिलोदिमाग पर सकारात्मक असर होगा और हिन्दू आतंकवाद या संघी आतंकवाद जैसे शब्दों के अनुप्रयोग से कांग्रेस के प्रति हिंदुओं में जो नफरत का भाव पैदा हो गया है, उसमें एक हद तक कमी आएगी। यह स्थिति बीजेपी की राजनीतिक सेहत के लिए अच्छी नहीं समझी जा सकती है।
सच कहा जाए तो राहुल गांधी ने सदन में नियम और परंपरा की परवाह किए बगैर सुर्खियां बटोरने वाला कार्य किया और अपने वादे-इरादे में अपेक्षाकृत सफल भी रहे। जानकार भी बताते हैं कि आमतौर पर बजट सत्र को छोड़कर चलते हुए सदन में इस तरह गले मिलने या गले पड़ने की परम्परा कभी नहीं रही और न ही किसी ने ऐसी कोई कोशिश की। स्पष्ट है कि मोदी से सियासी दुश्मनी के बीच जैसा शिष्टाचार श्री गांधी ने प्रदर्शित किया है, उसके पीछे उनकी कोई सुविचारित रणनीति है, क्योंकि आम चुनाव 2019 ज्यादा दूर नहीं है। 
उधर, पीएम मोदी ने भी पूरी बहस के दौरान हुई अपनी तल्ख आलोचनाओं के बावजूद बिना क्रोधित हुए जिस तरह से खुद को संयमित रखा, वह लोकतंत्र की परंपरा की दृष्टि से एक सुखद शुरुआत है, क्योंकि अबतक के अधिकांश प्रधानमंत्री अपनी आलोचनाओं से बौखला जाते थे जिसका असर उनके मुखारबिंद पर दिख जाता था। कुछ पीएम तो बीच में उठकर टोका-टाकी भी करते थे। इस मामले में पीएम मोदी अपवाद निकले।   

कमलेश पांडे, वरिष्ठ पत्रकार व स्तम्भकार

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