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ट्रंफ-किम वार्ता: जग की ऐसी रीति, बिनु भय होंहि न प्रीति



अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंफ और उत्तर कोरिया के शासक किम जोंग उन के बीच सिंगापुर शिखर बैठक के बाद जो पारस्परिक सोच-समझ विकसित हुई है, वह कई मायने में कूटनीतिक सफलता का परिचायक है और ऐतिहासिक भी। इसके दूरगामी प्रभावों से इंकार नहीं किया जा सकता है। दरअसल, अपने-अपने स्वाभाविक सनक, व्यक्तिगत हनक और प्रशासनिक ठसक से इतर दोनों नेताओं ने जिस वार्ता कौशल, आपसी व्यवहार कुशलता और द्विपक्षीय कार्य प्राथमिकता को  प्रदर्शित किया है, उसकी आशा बहुतों को नहीं थी। इसलिए यह समझा जा रहा है कि उनकी इस अप्रत्याशित करवट से निकट भविष्य में दुनियावी कूटनीति में कई और बड़े बदलाव देखने को मिलेंगे जिसकी आशंका सम्बन्धित देशों को भी है। इसलिए  इसके दूरगामी प्रभावों से भी इनकार नहीं किया जा सकता।
आमतौर पर इससे भारत समेत अमेरिकी खेमा जहां लाभान्वित होगा, वहीं चीन-रूस समर्थक देशों की कतिपय ओछी चिंताएं भी बढ़ेंगी। क्योंकि इस महत्वपूर्ण बैठक से जो सबसे बड़ी बात स्पष्ट हुई है, वह यह कि चाहे पश्चिमी एशिया हो या कोरियाई प्रायद्वीप या फिर भारतीय उपमहाद्वीप, यदि वहां पर कोई जटिल द्विपक्षीय समस्या है तो उसे समुचित रूप से हल करने की कुव्वत यदि किसी में है तो वह सिर्फ अमेरिका में ही है; रूस-चीन जैसे अतिशय महत्वाकांक्षी देशों के पास तो कतई नहीं।
लिहाजा, अब यह अमेरिका का साहस है, दुस्साहस है या फिर वैश्विक कूटनीतिक हुनर, यह तो वही जाने। लेकिन उसके ताजा रुख से साफ है कि उसकी दुनियावी बादशाहत को चुनौती देने वाले बख्से नहीं जाएंगे, न भूतो न भविष्यति। इसलिए उससे स्वस्थ प्रतिस्पर्द्धा रखने वाले बड़े देशों को इस बारे में ठंडे दिमाग से सोचना चाहिए कि आखिर उनके रहते हुए भी एशिया, यूरोप और अफ्रीकी देशों में अमेरिका की ही कूटनीतिक दाल क्यों गल जाती है? आखिर ऐसा क्यों है कि यदाकदा उत्तर कोरिया, ईरान, इराक, पाकिस्तान आदि को उकसाने वाले क्षुद्र देश उनके प्रतिस्पर्द्धी राष्ट्रों विशेषकर अमेरिका की भृकुटि तनते ही खामोश हो जाते हैं। ऐसा लगता है कि जैसे उन्होंने कुछ किया ही नहीं है।
आप मानें या न मानें लेकिन मौजूदा हालात इस बात की स्पष्ट चुगली कर रही हैं कि एशिया और अमेरिका की पारस्परिक प्रासंगिकता मौजूदा सदी में भी बनी रहेगी। इसलिए रूस-चीन जैसे देश, जो यूरोप, एशिया और अफ्रीका में अपना पांव पसारने की जुगत बिठा रहे हैं, उन्हें यह साफ समझ लेना चाहिए कि जब वे अपने पास-पड़ोस के देशों को नैतिक रूप से दुरुस्त नहीं रख सके, तो शेष देश-दुनिया के लिए कितना उपयोगी साबित होंगे ऐसा आकलन वे खुद ही कर लें तो अच्छा रहेगा। क्योंकि अमेरिकी प्रभाव से ग्रसित कोई भी देश या उसका बुद्धिमान नेतृत्व, अब सब कुछ समझ बुझ कर भी ऐसे खल  देशों को नजरअंदाज कर रहे हैं और फूंक फूंक कर अपना कूटनीतिक कदम बढ़ा रहे हैं।
इसलिए सिंगापुर शिखर बैठक के गहरे कूटनीतिक निहितार्थों को नए सिरे से समझने की जरूरत है, क्योंकि आने वाले दिनों में कमोबेश सारे देश इससे प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से गहरे तक प्रभावित होंगे। कहना न होगा कि इस बैठक की सफलता से ट्रंफ का सियासी कद भी ऊंचा उठा है और अमेरिका की कूटनीतिक किस्मत भी चमकी है। इस बैठक के बाद शेष दुनिया में उसकी स्वीकारोक्ति भी बढ़ी है। यह सही है कि अमेरिका की दुनियावी दादागिरी को पहले रूस और अब चीन और गाहे-बगाहे दोनों से कड़ी चुनौती मिल रही है, जिसके मोहरे कुछ गरीब देश या उनका बहसी नेतृत्व बन रहे हैं। लेकिन जिस सियासी सलीके से अमेरिका इनसे निबट रहा है, इसके लिए तो उसकी दाद देनी ही होगी। वाकई एशिया और यूरोप की पंचायती अमेरिका जिस जज्बे से करता है, उसकी सलामी तो उसे मिलनी ही चाहिए।
खासकर, बहसी शासकों, उनके परमाणु बमों और इसे ढोने वाली उनकी मिसाइलों से जुड़े विविध महत्वाकांक्षी कार्यक्रमों की हवा जिस सलीके और तरीके से अमेरिका निकालने का आदी बन चुका है, वह दुनियावी जरूरत भी है और समसामयिक वैश्विक राजनीति की कड़वी हकीकत भी। क्योंकि कतिपय देश आतंकियों और नक्सलियों के सबसे बड़े रहनुमा बनकर उभरे हैं। ऐसा इसलिए कि उन्हें अपने प्रतिस्पर्द्धी देशों को बर्बाद करना है। जबकि अमेरिका अपने मित्र देशों की हिफाजत करता है और अपने विरोधी देशों को उन्हीं के हथकंडे से बर्बाद भी, चाहे उन्हें प्रोत्साहित करने वाला कोई भी बड़ा देश कितना भी शातिर क्यों न हो। यही वजह है कि अमेरिका सबकी पहली पसंद आज भी है।
अमेरिका की इस सफलता के पीछे उसकी अमेरिकी फर्स्ट वाली नीति है जिसमें शेष दुनिया के लोगों का स्थान उसके बाद है।यानी कि अपनी-अपनी हैसियत और अमेरिकी जरूरत के मुताबिक। दो टूक कहें तो जिसकी उपयोगिता होगी उन्हें वरीयता मिलेगी, अन्यथा कतई नहीं। इसलिए न तो कोई इंतजार करे और न ही बेकरार रहे। मसलन, अब तक जो गुप्त अमेरिकी नीति-रणनीति रही है, अब उसके मुखर प्रवक्ता बन चुके हैं राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंफ। बहरहाल, वह देश-दुनिया को प्रभावित करने वाले हर फैसले 'अमेरिकी फर्स्ट' के नजरिए से कर रहे हैं। वह इस बात से बिल्कुल बेपरवाह नजर आ रहे हैं कि शेष दुनिया उनके प्रत्येक कदम का क्या आशय निकालेगी, और किसको किस प्रकार से लेगी। क्या यूरोप, क्या एशिया, क्या अफ्रीका, किसी भी मित्र देश को ज्यादा घास डालने की मंशा राष्ट्रपति ट्रंफ ने कभी नहीं दिखाई। यही वजह है कि उनकी सनक, प्रशासनिक हनक और व्यक्तिगत ठसक की ताजा सिंगापुर सफलता की चर्चा आज हर कोई कर रहा है। ऐसा इसलिए कि व्यापारी जब राजनेता बन जाता है तब भी अपने लाभ को सर्वोपरि रखने वाले हुनर को आजमाना नहीं भूल पाता और इस हेतु किसी भी हद तक गुजर जाना उसकी स्वाभाविक फितरत होती है।
इस लिहाज से देखा जाए तो राष्ट्रपति ट्रंफ की कूटनीति का सार है बिनु भय होंहि न प्रीति। यानी कि साम, दाम, दंड, भेद- सबका एक समान उपयोग हो। इसके वरीयता क्रम की उपेक्षा तो कतई नहीं हो। यही वजह है कि जब उत्तर कोरिया के अतिशय उग्र शासक किम जोंग उन भी उनके इस पैंतरे के वशीभूत हो गए तो अब दूसरों की क्या औकात समझी जाए! यूं तो इराक के पूर्व राष्ट्रपति सद्दाम हुसैन और अलकायदा प्रमुख ओसामा बिन लादेन के सैन्य हश्र को दृष्टिगत रखते हुए उत्तर कोरिया सुप्रीमो किम जोंग उन का झुकना स्वाभाविक नहीं है, लेकिन ऐसा करते हुए उन्होंने जिस राजनैतिक व कूटनीतिक चतुराई का परिचय दिया और अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंफ को अंततोगत्वा पटा ही लिया, वह काबिले तारीफ है, अन्यथा कुछ भी अनिष्ट सम्भव था।
इतिहास साक्षी है कि अमेरिका ने देश-दुनिया के अधिकांश दुस्साहसी फैसलों का समाधान अपने मनमाफिक ही किया है, चाहे वह जैसे भी किया हो। इस दौरान उसकी ओर उंगलियां तो कई उठीं, लेकिन किसी से भी उसका कुछ नहीं बिगड़ा। हां, कुछ आतंकी घटनाएं उसकी सरजमीं पर बढ़ीं और उसका रक्षा बजट बढ़ा। इस बार भी ट्रंफ ने कुछ वैसा ही करने की हिमाकत दिखाई और फिर चतुराई पूर्वक पलट गए। यही नहीं, ट्रंफ जिस तरह से रूसी राष्ट्रपति ब्लादिमीर पुतिन और चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग की हरेक कूटनीतिक गतिविधियों से अतिशय सावधानी बरत कर चल रहे हैं, और यदाकदा करारा जवाब अपने कार्यों से दे रहे हैं, वैसा हुनर सबमें नहीं होता। हां, भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जिस तरह से उन्हें साधा और बांधा है, उसके लिए दोनों का मिलता-जुलता स्वभाव ज्यादा उत्तरदायी है।
सच कहा जाए तो अंतरराष्ट्रीय क्षितिज पर समसामयिक दौर के जितने भी दिग्गज नेता हैं उनमें से अधिकांश राजनेता बिनु भय होंहि न प्रीति वाली कूटनीति में विश्वास करते हैं। उनकी वैश्विक कूटनीति का मूल मर्म बन चुका है साम, दाम, दंड और भेद वाली राजकाज की नीति, जिसका उचित प्रयोग करना वे लोग सीख चुके हैं। शायद इसी के चलते वे लोग अपने-अपने देश में सफल भी हैं और दीर्घावधि से काबिज भी। अमेरिकी-भारतीय नेतृत्व इसका अपवाद है। फिर भी कहना न होगा कि दुनिया को अपने मनोनुकूल चलाने में ये कड़कदार, रोबीले शासक कितना सफल होंगे, यह तो वक्त बताएगा, हम नहीं।
सीधा सवाल है कि ट्रंफ आखिर करें भी तो क्या करें। जिस विकट दुनियावी दौर में उन्होंने दुनिया का थानेदार समझे जाने वाले अमेरिका की सियासी और कूटनीतिक लगाम सम्भाली है, उसमें उसकी वैश्विक बादशाहत बरकरार रखना सबसे बड़ी चुनौती है। आलम यह है कि अमेरिका के चिर परिचित शत्रुओं के अलावा उसके कई मित्र देश भी उसे आंखें दिखा रहे हैं। इसलिए उन्होंने एकला चलो और लाभ आधारित मित्रता की नीति अपनाई है ताकि एन केन प्रकारेण उन्हें अपने लक्ष्य में सफलता मिले, जिसे पाना उनका प्रथम लक्ष्य है।
यही वजह है कि किम से मिलने के बाद ट्रंफ ने साफ कहा है कि युद्ध तो कोई भी कर सकता है, लेकिन शांति लाना सिर्फ बहादुरों के बस का काम है। अब इतिहास का नया अध्याय शुरू हुआ है। किम के लिए यह बड़ा मौका है। हमने एक दूसरे को ठीक से जाना है। परमाणु निरस्त्रीकरण के लिए सहमति बनी है। बातचीत उम्मीद से कहीं बेहतर हुई है। कोई भी जितना उम्मीद कर सकता है उससे बेहतर बातचीत हुई है। हम दोनों के बीच बेहतर रिश्ते हैं और हम मिलकर बड़ी समस्या का हल करेंगे।
यह ऐतिहासिक पल है। उधर, किम ने भी स्पष्ट कहा है कि दुनिया आने वाले दिनों में बड़ा बदलाव देखेगी। हमारे बीच की मुलाकात एक तरह से सफल रही है। हमने बीती बातों को पीछे छोड़ने का फैसला किया है।
समझा जा रहा कि आपसी समझौते के अनुरुप उत्तर कोरिया अपने मिसाइल टेस्टिंग सेंटर को खत्म कर देगा, क्योंकि अमेरिका उसे ऐसी सुरक्षा गारंटी देने को तैयार है ताकि उसे लगे कि परमाणु निशस्त्रीकरण से उसका अंत नहीं होने जा रहा। 
हालांकि सबको पता है कि उत्तर कोरिया ने अपनी परमाणु टेस्ट साइट को ही नष्ट किया है, लेकिन परमाणु हथियारों के जखीरे को नष्ट करना एक बड़ी बात होगी, जिसे लेकर किम जोंग उन ने अपने पत्ते अभी नहीं खोले हैं, लेकिन पूरी दुनिया की निगाहें इसी पर टिकी हुई हैं।
एक और बात साफ है, वह यह कि भले ही चीन एक अरसे से उत्तर कोरिया पर अपना प्रभाव रखता आया है और उसके गिने-चुने मित्र राष्ट्रों में भी शुमार किया जाता है। लेकिन अब जबकि उत्तर कोरिया अपनी राजनीति तथा कूटनीति दोनों बदल रहा है तो दोनों के आपसी और भरोसेमंद रिश्तों का भविष्य में क्या होगा, अभी कहना थोड़ा मुश्किल है।
                                                                                           कमलेश पांडे, वरिष्ठ पत्रकार व स्तम्भकार


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