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पीएम मोदी की हत्या के षड्यंत्र से उभरती आशंकाएं, बढ़ती चिंताएं

गम्भीरता पूर्वक तलाशने होंगे स्वदेशी-विदेशी कनेक्शन



लीजिए, नक्सलियों, आतंकियों और अंडरवर्ल्ड का सफाया करने की कीमत अब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को अपनी जान देकर चुकानी पड़ सकती है, क्योंकि वह ऐसे तत्वों की हिट लिस्ट में हैं! उनकी हत्या कैसे सम्भव होगी, इस बात का खाका भी माओवादी नक्सलियों द्वारा खींचा जा चुका है; बिल्कुल पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी हत्याकांड के तर्ज पर। दरअसल, पुलिस के हाथ लगे एक पत्र से जाहिर है कि पीएम मोदी के किसी भी रोड शो को इस तरह के दुस्साहस को अंजाम देने के लिए सबसे उपयुक्त जगह समझा गया है। शुक्र मनाइए कि समय रहते ही इस षड्यंत्र का पर्दाफाश हो गया, अन्यथा राष्ट्र एक बार फिर से साम्प्रदायिकता की आग में झुलस जाता। यह बात दीगर है कि तब नेतृत्व संकट की अंधी गलियों में भटकने को भी यह देश अभिशप्त हो जाता। यही वजह है कि इस षड्यंत्र के खुलासे के बाद कतिपय राष्ट्रीय चिंताओं का उभरना स्वाभाविक है।
हैरत की बात है कि वीवीआईपी लोगों की सुरक्षा में अमूमन होने वाली ऐसी चूकों और इसी के चलते अब तक तीन महत्वपूर्ण राष्ट्रीय नेताओं यथा- महात्मा गांधी, इंदिरा गांधी और राजीव गांधी को खो देने पर ताजा बहस करने और कोई स्तरीय सुरक्षा चक्र विकसित करने जैसी बातों पर ध्यान देने, पारस्परिक विमर्श करने की जगह सत्ता पक्ष और विपक्ष आपसी तू-तू,मैं-मैं में जुटा हुआ है। एक तरफ महागठबंधन वाले विपक्ष दल इसे महज शिगूफा करार दे रहे हैं, तो दूसरी तरफ सत्ताधारी दल के नेता इसे राजनीतिक साजिश करार देने से पीछे नहीं हट रहे हैं। यह भी कड़वा सच है कि एनडीए और यूपीए के कई साथी दलों के नेताओं का नक्सली कनेक्शन किसी से छिपी हुई बात नहीं है। आतंकवादियों का भी कनेक्शन कतिपय धर्मनिरपेक्ष नेताओं से है। कोढ़ में खाज यह है कि नक्सलियों, आतंकवादियों और अंडरवर्ल्ड के सरगनाओं में अब आपसी समझदारी विकसित हो चुकी है जिसने भारत सरकार और अन्य राज्य सरकारों की चुनौतियां भी बढ़ा दी हैं।
देखा जाए तो यह न तो कोई पहली घटना है और न ही इसे अंतिम षड्यंत्र समझा जा सकता है। इससे पहले भी मोदी इस्लामिक अतिवादियों और आतंकवादियों के निशाने पर रहे हैं और उन्हें जेड प्लस की सुरक्षा प्राप्त है। इसलिए माओवादियों का षड्यंत्र नया जरूर है, लेकिन उसकी प्रकृति और प्रवृति वही पुरानी है जिससे बचकर चलना मोदी की सुरक्षा प्राथमिकताओं में शामिल है। फिर भी अविलम्ब पीएम मोदी के एहतियाती सुरक्षा चक्र की समीक्षा करके उसे और मजबूत किया जाना चाहिए। साथ ही, महज लोकप्रियता हासिल करने की गरज से अपने ही सुरक्षा चक्र को छोड़कर बाहर जाने से पहले पीएम मोदी को सौ बार सोचना चाहिए। उन्हें यह बात हमेशा याद रखनी चाहिए कि एक प्रधानमंत्री और एक पूर्व प्रधानमंत्री को यह देश खो चुका है। इसलिए अतिरिक्त सावधानी जरूरी है।
हालांकि गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने भी इस अहम खुलासे के मद्देनजर देशवासियों को आश्वस्त किया है कि पीएम की सुरक्षा को लेकर सरकार सख्त है। फिर भी यह सुलगता सवाल तो है ही कि सरकार तो पहले भी सख्त रही, लेकिन वीवीआईपी हत्याकांडों को टाला नहीं जा सका। इसलिए इस बार कुछ अतिरिक्त व विशेष उपाय अपेक्षित है जो किया भी जाना चाहिए। याद दिला दें कि राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की हत्या राष्ट्रीय राजधानी नई दिल्ली स्थित तीस जनवरी-बिड़ला मन्दिर मार्ग में, तत्कालीन प्रधानमंत्री श्री मती इंदिरा गांधी की हत्या नई दिल्ली स्थित उनके प्रधानमंत्री आवास में, पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी की हत्या तमिलनाडु में आयोजित एक चुनावी जनसभा के दौरान रात्रि में की जा चुकी है, इसलिए पीएम मोदी को भी खोने का डर पहले भी हर किसी के दिलोदिमाग में छाया रहता है जो अब और बढ़ जाएगा। इसलिए उनकी सुरक्षा घेरा बढ़ा देनी चाहिए और लोकप्रियता अर्जित करने के उनके सामान्य तौर-तरीकों के बारे में भी उन्हें अत्यधिक सजग कर दिया जाना चाहिए। इस बाबत ऐसा प्रोटोकॉल विकसित किया जाना चाहिए कि कोई भी पीएम या अन्य वीवीआईपी उसे तोड़ नहीं सके। अब इसे मानना या न मानना उन पर भी निर्भर है।
हमें यह बात नहीं भूलनी चाहिए कि नेता जी सुभाषचन्द्र बोस, तत्कालीन प्रधानमंत्री लालबहादुर शास्त्री और जनसंघ के राष्ट्रीय अध्यक्ष दीन दयाल उपाध्याय की मौत या 'हत्या' का सवाल भी आज तक रहस्य के घेरे में है। यदि आप गौर फरमाएंगे तो  उपरोक्त तमाम नेता असाधारण प्रतिभा के स्वामी थे जो हरवक्त स्वदेशी-विदेशी ताकतों की आंखों में चुभते थे। इसलिए महात्मा गांधी हत्याकांड में शक की सुई हिन्दू महासभा की ओर, इंदिरा गांधी हत्याकांड में शक की सुई पंजाबी आतंकवादियों की ओर, राजीव गांधी हत्याकांड में शक की सुई लिबरेशन टाइगर ऑफ तमिल इलम की ओर ही घूमी, जिनके अंतरराष्ट्रीय कनेक्शन किसी से भी छिपे हुए नहीं हैं। इसके अलावा, नेताजी सुभाष चन्द्र बोस की हवाई जहाज दुर्घटना में हुई मौत और लालबहादुर शास्त्री की ताशकंद, रूस में हुई मौत में भी विदेशी ताकतों के षड्यंत्र से इनकार किया जा सकता है, लेकिन तत्कालीन परिस्थितियों के मद्देनजर उस पर सहसा विश्वास किसी भी भारतीय को नहीं होता।
कहने का तातपर्य यह कि यदि सुभाषचन्द्र बोस, महात्मा गांधी, लालबहादुर शास्त्री, दीनदयाल उपाध्याय, इंदिरा गांधी और राजीव गांधी की नृशंस हत्या या अस्वाभाविक मौत नहीं हुई होती तो आज देश का राजनैतिक इतिहास कुछ और होता। विकास का पैमाना भी कुछ अलग ही होता। हालांकि कहा जाता है कि वक्त अपना नायक ढूंढ लेता है, और फिलवक्त पीएम नरेंद्र मोदी के रूप में वह ढूंढ भी चुका है, जिनके कुशल नेतृत्व में देश-दुनिया में भारत की एक नई पहचान बनी और विकसित हुई है। बेशक, राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एक सख्त प्रशासक के रूप में जो उनकी छवि उभरी है, उससे आतंकवादियों, नक्सलियों और अंडरवर्ल्ड के हौसले पस्त हैं। भारतीय सुरक्षा बल और पुलिस की जैसी संयुक्त कार्रवाई उनके खिलाफ हो रही है, उससे उनके डॉन और उनके सम्पर्क में रहने वाले सफेदपोश नेता भी परेशान हैं। कुछ तो अपना अहंकार त्यागकर महागठबंधन में बने रहने को लालायित हैं। कुछेक एनडीए को छोड़कर महागठबंधन में जाने को लालायित हैं।
सच कहा जाए तो अब तक भारत को अपने प्रभाव में रखने वाले पड़ोसी देश भी परेशान हैं और उनकी आका समझी जाने वाली उभरती हुई महाशक्तियां भी। इसलिए स्वाभाविक है कि पीएम मोदी की हत्या का षड्यंत्र रचने वालों को विदेशी शह भी प्राप्त हो, जिसका खुलासा निष्पक्ष जांच के बाद भी हो पायेगा।
बहरहाल, पीएम मोदी की हत्या के षड्यंत्र में जिस तरह से जेएनयू कनेक्शन की बात सामने आ रही है, उससे स्पष्ट है कि लाल गलियारा के लाल आतंक की जद में अब पूरा देश आ चुका है। पूर्वी और दक्षिणी भारत का यह आतंक अब पश्चिमी और उत्तरी भारत में भी अपनी जड़ें जमा रहा है। ऐसा इसलिए कि आतंकवादियों, नक्सलियों और अंडरवर्ल्ड के मानवाधिकारों का रोना रोने वाले लोग दो कौड़ी पर बिकने वाले बुद्धिजीवी इंसान हैं जिनसे किसी भी सभ्य समाज को खतरा हो सकता है।इसलिए घने जंगलों में हथियार थाम कर और कंक्रीट के घने जंगलों में कलम-कीपैड लेकर जो लोग दिन-रात विघटनकारी ताकतों और हिंसक-प्रतिहिंसक मानसिकता के लोगों को बढ़ावा दे रहे हैं, उनके खिलाफ न केवल पुलिसिया दबिश बढ़ाई जानी चाहिए, बल्कि बेहद सख्त कार्रवाई करनी चाहिए। अन्यथा यदि वह अपने नापाक इरादों में कामयाब हो गए तो इससे बड़ी राष्ट्रीय क्षति कुछ भी नहीं होगी।
इस बात में कोई दो राय नहीं कि भीमा-कोरेगांव हिंसा मामले में गिरफ्तार रोना विल्सन के घर से बरामद एक पत्र से उक्त बात का खुलासा हुआ है, क्योंकि इस मामले की जांच कर रही पुणे  पुलिस ने गत दिनों जिन पांच माओवादियों को गिरफ्तार किया और पुणे की सत्र अदालत में उन्हें पेश किया; और इसी दौरान सरकारी वकील ने पुलिस के इस पत्र को न्यायालय को सुपुर्द किया जिससे इस सनसनीखेज जानकारी का खुलासा हुआ है। इसके बाद अदालत ने भी पांचों अभियुक्तों को 14 जून तक के लिए पुलिस कस्टडी में भेज दिया है जहां इनसे सघन पूछताछ चल रही है। सम्भव है कि इस पूछताछ के बाद भी कुछ अहम खुलासे हों। बता दें कि पुलिस की गिरफ्त में आए इन पांच माओवादी लोगों में नागपुर से गिरफ्तार वकील सुरेंद्र गडलिंग, महेश राउत एवं प्रो शोमा सेन; दिल्ली से गिरफ्तार रोना विल्सन; और मुंबई के गोवंडी इलाके से गिरफ्तार दलित कार्यकर्ता सुधीर धवले के नाम शामिल हैं।

                                                                                                कमलेश पांडे, वरिष्ठ पत्रकार व स्तम्भकार

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