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आखिर क्या है पीएम मोदी द्वारा हरिवंश की तारीफ किए जाने के सियासी मायने?

सियासी जीवन में ऐसे उदाहरण बिरले ही मिलते हैं जब कोई बड़े कद का राजनेता, किसी उभरते हुुुए सज्जन नेता की मुक्त कंठ से प्रशंसा करे। लेकिन बीजेपी नेता और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने राज्यसभा केे नवनिर्वाचित उपसभापति हरिवंश सिंह को तहेदिल सेे बधाई देते हुए ऐसा किया और उनके काफी गुण गाए जिससे सदन गुदगुदा उठा। लिहाजा, पीएम मोदी के मुंह से धाराप्रवाह अपनी तारीफ सुनकर हरिवंश सिंह पहले तो सकपकाए, फिर भीतर ही भीतर मुस्कुराने लगे। स्पष्ट है कि पीएम मोदी पूरी तैयारी के साथ सदन में आए थे। उन्होंने हरिवंश सिंह के बारे में तमाम सारगर्भित जानकारियां जुटा ली थी, जिसे एक एक कर सदन से साझा भी  किया। साथ ही, यह भी कहा कि अब सब कुछ 'हरि' भरोसे ही चलेगा। 
लेकिन, जो लोग पीएम मोदी को जानते हैं उन्हें पता है कि वो कुछ भी अनायास नहीं करते, बल्कि उनके हरेक काम के पीछे एक  सुनियोजित रणनीति होती है जिसमें कुछ गहरे सन्देश भी छिपे होते हैं। इन्हें समझे बिना आप मोदी की सियासी चालों को कभी नहीं समझ सकते। यही वजह है कि मिशन 2019 के मद्देनजर एनडीए के नए-पुराने सहयोगी दलों को रिझाने के लिए पीएम मोदी ने जिस 'रिलेशनशिप डिप्लोमेसी' का आगाज किया है, उसके गहरे राजनैतिक मायने हैं। इसके देशज निहितार्थों और सियासी समीकरणों को प्रतिपक्ष के लिए समझना जरूरी है, अन्यथा 2014 की तरह एक बार फिर वह मात खा जाएगा।क्योंकि मोदी एक मंजे हुए राजनेता हैं और उड़ती सियासी चिड़ियों को बखूबी पहचानते हैं। इसलिए एक हद तक सफल भी हैं। 
इस बात में कोई दो राय नहीं कि पीएम मोदी की इस उदार पहल से जदयू और बीजेपी के अपेक्षाकृत तल्ख़ रिश्तों में एक नई मिठास घुुुली है। उम्मीद तो यह भी है कि इससे मोदी-नितीश केे आपसी दांवपेंच भरे सम्बन्ध भी निकट भविष्य में सहज होंगे, अपेक्षाकृत सामान्य होंगे और एक दूसरे के ऊपर सकारात्मक असर डालेंगे जिससे गठबंधन को मजबूती मिलेगी। दरअसल, पीएम मोदी को पता है कि सबका साथ-सबका विकास (2014) की मुहिम से साफ नीयत-सही विकास (2019) की मुहिम तक पहुंचते पहुंचते गंगा-यमुना में बहुत सियासी पानी बह चुका होगा। इससे जो वैचारिक विडंबनाओं की लहर पैदा होगी, उसका मुकाबला अकेले नहीं किया जा सकता। खासकर तब जबकि दलित-पिछड़ी-अल्पसंख्यक सियासी पार्टियां कांग्रेस से प्रेम के पींगे बढ़ा रही हो। इसलिए एनडीए के नए विस्तार के लिए पुराने साझेदारों से नितांत नई समझदारी विकसित करने में ही बीजेपी और देश दोनों की भलाई निहित है। कहने का तातपर्य यह कि जो लोग मोदी से रूठे हैं, वे मोदी की पुचकार से ही मानेंगे। इसलिए तो मोदी ने पहल कर दी है।
राजनीतिक मामलों के जानकार भी बता रहे हैं कि अब एनडीए की पुुुरानी सहयोगी पार्टी जदयू और उसके मुखिया बिहार के मुख्यमंत्री नितीश कुमार के अच्छे दिन आने वाले हैं। क्योंकि हरिवंश नारायण सिंह के उपसभापति बनने से एनडीए में जदयू का महत्व अचानक बढ़ चुका है। इस बात में कोई दो राय नहीं कि यदि कांग्रेस की सहयोगी पार्टी एनसीपी की तरह ही बीजेपी की सहयोगी पार्टी जदयू अपने कदम खींच लेती तो एनडीए के पल्ले उपसभापति का पद कभी नहीं पड़ता। दरअसल, जेडीयू के समाजवादी होने का लाभ उसे मिला। इसलिए बीजेपी यदि मिशन 2019 के मद्देनजर अपने सहयोगियों को खुली छूट देती है तो सम्भव है कि कांग्रेसी महागठबंधन बनने के पहले ही बिखर जाए, जैसा कि राज्यसभा के उपसभापति के चुनाव में देखा गया।
यही वजह है कि निकट भविष्य में जदयू के एक-दो नेताओं को मोदी मंत्रिमंडल में जगह भी मिल सकती है, क्योंकि अब तक ऐसा नहीं होना सियासी गलियारों में चर्चा का विषय बना हुआ है। नियमतः एनडीए में जदयू की पुनर्वापसी के बाद ही केंद्रीय मंत्रिमंडल में उसका हक दे दिया जाता, ताकि वह बिहार में और मजबूत हो पाती। विशेषकर राजद के मुकाबले। सम्भव है कि राजग संयोजक का पद भी उसके काबिल नेता नीतीश कुमार को ही सौंप दिया जाए, जो कि मिशन 2019 के तहत समाजवादी पृष्ठभूमि वाले नेताओं को पटाने में काम आएगा। क्योंकि जदयू के दो पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष जार्ज फ़र्नान्डिस और शरद यादव जब इस जिम्मेवारी का कुशलतापूर्वक निर्वहन कर चुके हैं तो नीतीश कुमार भी ऐसा कर सकते हैं। राज्यसभा के उपसभापति के चुनाव में उन्होंने अपनी उपयोगिता साबित भी कर दी है।
आपने देखा होगा कि पीएम मोदी ने हरिवंश सिंह की जन्मभूमि बलिया, यूपी की ऐतिहासिक चर्चा करते-करते उनके शैक्षणिक शहर बनारस (पीएम मोदी का संसदीय क्षेत्र) का भी बखान कर दिया। ऐसा इसलिए कि बलिया-गाजीपुर व उसके पड़ोसी जिलों के बहुत सारे क्षत्रिय मतदाता बनारस में भी वोटर हैं, जिन्हें लुभाना मोदी नहीं भूले। यही नहीं, श्री मोदी ने जिस लहजे और अंदाज में हरिवंश सिंह के द्वारा अर्जित उपलब्धियों, उनके लगावों और कृतियों का बखान किया, उसका स्पष्ट इशारा है कि श्री सिंह हरेक नजरिए से काबिल इंसान है और सियासत में उनकी बड़ी भूमिका देखने को वे उत्सुक हैं।तभी तो उनके गृह जनपद बलिया से जुड़े कुछेक महत्वपूर्ण दृष्टांत देते हुए बेबकीपूर्वक उनसे जो अपेक्षा जताई, उसके गहरे सियासी निहितार्थ हैं। शायद केंद्रीय गृहमंत्री राजनाथ सिंह, असम्बद्ध राज्यसभा सदस्य अमर सिंह, मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ जैसे क्षेत्रीय और स्वजातीय राजनेता पीएम मोदी की सियासी पेंच को ज्यादा बेहतर तरीके से समझ सकते हैं।
सच कहा जाए तो हरिवंश सिंह की वाजिब तारीफ करके पीएम मोदी ने मिशन 2019 के लिहाज से अपनी सम्भावित मुश्किल राह थोड़ी और आसान करने की सराहनीय कोशिश की है। लेकिन बातों ही बातों में वो यह एहसास करवाना नहीं भूले कि यदि उनके खिलाफ कभी गोलबन्द तो कभी बिखरे विपक्षी महागठबंधन की ओर से यदि आंशिक चुनौती भी मिलती है तो उनके मुकाबले असफल होने की बजाए वो अपने सियासी पिटारे से ऐसे ईमानदार और जुनूनी समाजवादी नेताओं को भी आगे बढ़ाने से नहीं हिचकिचाएंगे, लेकिन कांग्रेस और भ्रष्ट समाजवाद मुक्त भारत बनाने के अपने नेक इरादे से कभी भी पीछे नहीं हटेंगे।
बेशहक, पीएम मोदी ने खुले तौर पर ऐसा न कहते हुए भी छायावादी भाषा में बहुत बड़ी बात कह दी है जिसे समझने की जरूरत है। क्योंकि ऐसा करके पीएम मोदी ने एक तीर से कई शिकार किए हैं। दरअसल, प्रधानमंत्री मोदी ने हरिवंश सिंह के गृह जिले बलिया की चर्चा करते हुए उनकी खूब तारीफ तो की ही, साथ ही उन्होंने प्रथम स्वतंत्रता संघर्ष का आगाज करने वाले अमर शहीद मंगल पांडे, चर्चित स्वतंत्रता सेनानी अमर शहीद चित्तू पांडे, दूसरे राजनारायण के नाम से चर्चित समाजवादी नेता और पूर्व प्रधानमंत्री स्व चंद्रशेखर सिंह, और सम्पूर्ण क्रांति के प्रणेता जयप्रकाश नारायण की महान बागी बलिया विरासत को संभालने और उसे आगे बढ़ाने की जो बात हरिवंश सिंह के बहाने छेड़ी है, वह अनायास नहीं बल्कि सवर्णों, समाजवादियों और देशप्रेम करने वाले स्वतंत्रता सेनानियों के परिजनों को साधने की गहरी सियासी चाल भी है। 
यही वजह है कि पीएम मोदी का भाषण सुनने के बाद केंद्रीय गृह मंत्री राजनाथ सिंह और बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार तो नहीं, लेकिन उनके समर्थक बेहद चिंतित नजर आए। क्योंकि उन्हें पता है कि सियासत में कोई किसी का सगा नहीं होता। हालांकि हरिवंश सिंह इसके अपवाद जरूर निकलेंगे, क्योंकि यह उनका स्वभाव है। अधिकांश लोग जानते हैं कि राजनीति में कभी भी दो जोड़ दो चार नहीं, बल्कि कुछ और ही होता है। जो इसे समझ गया, वही सियासत का सिकन्दर भी होता है। शायद पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर के समीप और सम्पूर्ण क्रांति के प्रणेता जयप्रकाश नारायण के करीब रहकर हरिवंश सिंह ने बखूबी देखा, समझा, परखा है, और पत्रकारिता के तल्ख अनुभवों के सहारे खुद को संवारते हुए इस मुकाम तक पहुंचे हैं। सम्भवतया मोदी को भी उनकी यही अदा पसन्द आई हो, जिसे उन्होंने सहजता पूर्वक अभिव्यक्त करके भारतीय जनमानस में अपना नंबर और बढ़ा लिया। क्योंकि उदारता भारतीयों का मूल डीएनए हैं।
हालांकि, कुछ लोग यह भी कयास लगा रहे हैं कि बीजेपी और एनडीए की क्षत्रिय राजनीति में राजनाथ सिंह के सामने हरिवंश सिंह के रूप में परोक्ष रूप से ही सही, लेकिन एक मजबूत स्वजातीय प्रतिद्वंद्वी आ खड़ा हुआ है। उधर, हरिवंश सिंह के विरोधी अब नीतीश कुमार को गुप्त रूप से यह पाठ पढ़ा रहे हैं कि कहीं समाजवादियों की सवर्ण राजनीति का मोहरा हरिवंश सिंह को बनाकर पीएम नरेंद्र मोदी, 2019 में अस्पष्ट बहुमत के आलोक में उनके पीएम बनने की उम्मीदों पर तुषारापात नहीं कर दें। ऐसा इसलिए कि 2019 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी को स्पष्ट बहुमत नहीं मिलने की अटकलों के बीच ही पीएम बनने के सपने पाले नीतीश कुमार दोबारा एनडीए में लौटे हैं, क्योंकि कांग्रेस वाले महागठबंधन में उन्हें यह मौका कभी नहीं मिलता। लेकिन अब जो पीएम ने परोक्ष राग छेड़ा है उसका निहितार्थ यही है कि यदि किसी कारण वश मोदी को जाना भी पड़ा तो समाजवादी मूल के ऐसे लोगों को ही अपना सियासी उत्तराधिकारी बनाकर जाएंगे ताकि बीजेपी के पुनः लौटने की संभावना जिंदा रहे। पीएम मोदी का यह कहना कि "श्री हरिवंश ने लोकनायक जय प्रकाश नारायण से प्रेरणा ग्रहण की है और पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर जी के साथ भी काम किया था। चंद्रशेखर जी के साथ काम करने की वजह से हरिवंश जी को पहले से ही इस बात का पता था कि चंद्रशेखर जी पद त्याग देंगे। लेकिन इस बात की खबर उन्होंने अपने समाचार पत्र को भी नहीं लगने दी जो कि सरकारी सेवा और नैतिकता के प्रति उनकी प्रतिबद्धता को दर्शाता है। हरिवंश जी का अध्ययन व्यापक है और उन्होंने बड़ी मात्रा में लेखन कार्य किया है। उन्होंने वर्षों तक समाज की सेवा की है।" बहुत बड़ी बात है। इन बातों से स्पष्ट है कि हरिवंश सिंह को पीएम मोदी सर्टिफिकेट मिल चुका है, जिसके लिए बहुत सारे नेता उतावले रहते हैं। दरअसल, ऐसा करके उन्होंने क्षत्रिय जाति में अपने प्रति पनपाये गए अविश्वास को पूरी तरह से धोने का यत्न किया है और उन्हें उम्मीद है कि पिछड़ी जाति के यादव की तरह ही पूरे देश में फैली सवर्ण जाति के राजपूतों का समर्थन भी उन्हें मिलेगा, क्योंकि यह समाजवादियों और कांग्रेसियों का परम्परागत वोट बैंक है, जो कि राजनाथ सिंह के साथ जुड़कर फिलवक्त बीजेपी को मजबूती प्रदान किये हुए है। बस, यह समर्थन जारी रहे, मोदी भी यही चाहते हैं।

                                                                                                    कमलेश पांडे,

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