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क्या कोई फरिश्ता आएगा सुरक्षा बलों की चिंता करने या फिर करेगी केंद्र सरकार?

आतंकियों, नक्सलियों और उपद्रवियों के निशाने पर हैं हमारे  सुरक्षाबल, सरकार बेपरवाह

चाहे जम्मू-कश्मीर हो या पूर्वोत्तर के कुछ राज्य या फिर नक्सलवाद प्रभावित राज्य, भारतीय सुरक्षा बल आतंकवादियों, नक्सलियों और उपद्रवियों के सीधे निशाने पर हैं। बावजूद इसके न तो हमारी सरकारें चेत रही हैं और न ही उन्हें चलाने वाले राजनीतिक दल। अमूमन, गठबंधन के दलदल में फंसकर केंद्र सरकार और विभिन्न सरकारें जिस तरह से कभी दो कदम आगे और चार कदम पीछे चल रही हैं, उससे हमारे सुरक्षा बलों का भी मनोबल टूट रहा है, उनका आत्मविश्वास डीग रहा है, अन्यथा आए दिन कहीं चोटिल होने तो कहीं शहादत देने की मार्मिक खबरें देखने-सुनने को नहीं मिलतीं। यही वजह है कि इस मसले पर अब हर कोई मुखर है और विभिन्न तरह के सवाल।खड़े किए जा रहे हैं।
हाल की कुछ घटनाओं पर नजर दौड़ाई जाए तो स्पष्ट है कि हमारे सुरक्षा बलों के हाथ बंधे हुए हैं और आतंकियों, नक्सलियों और उपद्रवियों के पौ बारह हो चुके हैं। ऐसा इसलिए कि क्षुद्र राजनीतिक दलों का कहीं प्रत्यक्ष तो कहीं परोक्ष शह उन्हें हासिल है। हैरत की बात है कि चार वर्ष बीतते-बीतते मोदी सरकार का भय भी उनके दिलोदिमाग से जाता में रहा। इसलिए सुलगता सवाल है कि आखिर ऐसा क्यों, कबतक और किसके लिए? कहीं ऐसा तो नहीं कि एक दूसरे को सियासी मात देने के चक्कर में हमारी सरकारें अपने मूल उद्देश्य से भटक चुकी हैं जो न केवल सुरक्षा बलों बल्कि आम लोगों पर भी भारी पड़ रही है।
गत दिनों जम्मू-कश्मीर के पुलवामा और शोपियां में आतंकवादियों ने जिस तरह से घात लगाकर सुरक्षा बलों पर हमला किया, उसमें आठ जवान और तेईस लोग घायल हो गए। उधर, पूर्वोत्तर के मेघालय की राजधानी शिलांग में भी उपद्रवियों ने एक सीआरपीएफ कैम्प पर पथराव किया जिसमें तीन जवान घायल हो गए। इससे पहले नक्सल प्रभावित राज्य छतीसगढ़ में नक्सलियों द्वारा सुरक्षा बलों के साथ की जाने वाली लोमहर्षक ज्यादतियां किसी से छिपी नहीं है। स्पष्ट है कि हमारी सरकार न तो अंतरराष्ट्रीय सीमा से लगे राज्य को नियंत्रित कर पा रही है और न ही अपने आंतरिक भूभाग वाले राज्यों की विधिव्यवस्था पर ही उसका पूर्ण नियंत्रण है। दो टूक कहा जाए तो विदेशी ताकतों की शह पर कतिपय नेताओं, आतंकियों-नक्सलियों-अपराधियों और धन्नासेठों की मिलीभगत से जो घिनौना खेल चल रहा है, वह बेहद चिंताजनक बात है।
यह कौन नहीं जानता कि जम्मू-कश्मीर में राज्य सरकार की मांग पर केंद्र सरकार द्वारा एकतरफा रमजानी सीजफायर किए जाने को लेकर सुरक्षा मामलों के जानकारों को जो आशंकाएं थीं, वो बिल्कुल सच साबित हो रही हैं। यही वजह है कि जब वहां पर अघोषित तौर पर सुरक्षा बलों के हाथ बंधे हुए हैं तो आतंकवादी एकबार फिर से बेखौफ हो चले हैं और लगातार सुरक्षा बलों पर ग्रेनेड के हमले कर रहे हैं। महज 5 दिनों में ही सुरक्षा बलों पर 12 ग्रेनेड हमले किए जा चुके हैं। हालांकि हमारे जवान भी जवाबी कार्रवाई कर रहे हैं, लेकिन सम्भल कर।
ऐसा इसलिए कि जब हमारे सुरक्षा बल ऐसे तत्वों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई करते हैं तो उस दौरान कोई न कोई पत्थरबाज या आम कश्मीरी भी उनकी कार्रवाई की जद में आ जाता है। और ऐसा होते ही जम्मू-कश्मीर पुलिस रंग बदल देती है और भारतीय सुरक्षा बलों के खिलाफ ही कार्रवाई करने से गुरेज नहीं करती, जो कि अनुचित है। दरअसल, ऐसी किसी भी घटना के बाद जम्मू-कश्मीर पुलिस सुरक्षा बलों को ही अपने निशाने पर लेती है, उनके खिलाफ प्राथमिकी दर्ज करती है और कथित तौर पर दोषी जवानों की गिरफ्तारियां तक सुनिश्चित करती है। इससे  स्पष्ट है कि केंद्र सरकार की पकड़ राज्य सरकार पर नहीं है जिससे हमारे सुरक्षा बलों की कार्यप्रणाली और उनका मनोबल दोनों प्रभावित हो रहा है। यही वजह है कि देश विरोधी ताकतों के सीने में गोली मारने की बजाय वो अपने बदन पर चोटें खाकर जख्मी या फिर सीने में गोलियां खाकर अमर शहीद हो रहे हैं।
बावजूद इसके, हमारी सरकारें वोट-वोट खेलने की राजनीति से बाज नहीं आ रही हैं। वो ये बात भी समझने को तैयार नहीं हैं कि हमारे सुरक्षा बल अलग-अलग राज्यों में किन किन  अनपेक्षित सुरक्षा चुनौतियों से जूझ रहे हैं और ऐसा करते हुए लगातार अपनी शहादत दे रहे हैं, अपनी बेशकीमती जान गंवा रहे हैं। हालांकि देश का जनमानस इन बिडम्बनापूर्ण परिस्थितियों से निरन्तर बेचैन हो रहा है और अपनी ही सरकार की बदनीयती से रुष्ट नजर आ रहा है। यह स्थिति किसी भी सरकार के दीर्घ सियासी स्वास्थ्य के लिए अनुकूल नहीं है। यह कोई शुभ राजनैतिक और प्रशासनिक संकेत भी नहीं है।
सच कहा जाए तो पहले मनमोहन सरकार और अब मोदी सरकार को जिस तरह से लोग एक ही तराजू पर तौलने को अभिशप्त दिखाई दे रहे हैं, इसके मद्देनजर केंद्र में सत्तारूढ़ मोदी सरकार को न केवल मुस्तैद हो जाना चाहिए, बल्कि राष्ट्रीय जन सुरक्षा हेतु बेहद सख्त मानक कार्रवाई करने से भी बाज नहीं आना चाहिए। लेकिन देखा जा रहा है कि ऐसे राष्ट्रविरोधी तत्वों से कड़ाई पूर्वक निबटने की बजाय हमारी कथित धर्मनिरपेक्ष सरकार गठबंधन की राजनीति के तहत कहीं रमजानी सीजफायर का आदेश दे रही है तो कहीं उपयुक्त रणनीति बनाकर कारगर कार्रवाई करने में निरन्तर विफल प्रतीत हो रही है।
इस बात में कोई दो राय नहीं कि इतने बड़े देश में आपराधिक मनोवृति से प्रोत्साहित होने वाली विभिन्न तरह की आकस्मिक विभत्स घटनाओं को रोका या टाला नहीं जा सकता। लेकिन यह भी सच है कि वैसी घटनाओं के बाद जितनी कड़ी कार्रवाई की जानी चाहिए, वैसा करने में हमारी विभिन्न केंद्र सरकारें प्रायः विफल रही हैं जिससे सीमाएं अशांत हैं और आंतरिक भूभाग जहां तहां सुलग रहा है। इससे ऐसे तत्वों का भी मनोबल बढ़ता है। बहरहाल, जिस लोकतंत्र के नाम पर और बहुमत छीजने के भय से हमारी सरकारें नरम कार्रवाई करती हैं और वैसा ही करते रहने की पक्षधर हैं, वह न तो व्यवहारिक है और न ही दूरदर्शितापूर्ण। यही वजह है कि आजादी के सात दशक बीत जाने के बाद भी हमारी सुरक्षा सम्बन्धी चिंताएं/समस्याएं जस की तस हैं और हमारे सुरक्षा बल तथा आमलोग इसकी भारी कीमत अदा कर रहे हैं, जिससे बचने के उपाय भी अविलम्ब करने होंगे अन्यथा अस्तित्व का संकट समुपस्थित हो सकता है।
                                                                                            कमलेश पांडे, वरिष्ठ पत्रकार व स्तम्भकार

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