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स्पष्ट हो गई सियासी तस्वीर

पने दम पर हासिल बहुमत के आंकड़े और राजग के घटक व समर्थक दलों के 31 सांसदों के समर्थन के दम पर बीते चार सालों से सफलतापूर्वक चल रही केन्द्र की मोदी सरकार के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाने का मायने और मकसद तो पहले से ही स्पष्ट था। यह तो तय ही था कि यह प्रस्ताव लोकसभा में भारी बहुमत से खारिज हो जाएगा और सरकार की बंपर जीत होगी। लिहाजा कहने को भले ही यह अविश्वास प्रस्ताव था लेकिन सरकार की स्थिरता को लेकर इसमें कोई अविश्वास नहीं था। अलबत्ता इसे लाने का मकसद भी सत्ता पक्ष को नुकसान पहुंचाने से ज्यादा अपने फायदे तक ही सीमित था और सरकार ने भी अपने लिये फायदे का सौदा समझकर ही इसे हाथों हाथ लपक लिया। तभी तो सत्र के पहले ही दिन इसे संसद में चर्चा के लिये स्वीकार कर लिया गया और स्वीकार किये जाने के 48 घंटे के भीतर ही इस पर चर्चा भी आरंभ हो गयी। लिहाजा 126 के मुकाबले 325 वोटों से इस प्रस्ताव के खारिज हो जाने के बाद अब सवाल है कि आखिर इससे किसको फायदा मिला और किसका व किस हद तक नुकसान हुआ। इस लिहाज से देखा जाये तो मुनाफे की बाजी भी सरकार ही मार ले गयी और विपक्ष को चैतरफा घाटा ही झेलना पड़ा। विपक्ष के लिये तो स्थिति यह हुई कि- ‘माया मिली ना राम, इधर के रहे ना उधर के रहे।’ अभी तक कम से कम संसद से लेकर सड़क तक विपक्षी महागठजोड़ की आस में तो विपक्ष का विश्वास बना ही हुआ था लेकिन अविश्वास प्रस्ताव की पूरी प्रक्रिया ने विपक्ष को बुरी तरह निराश कर दिया। विपक्षी एकता की पूरी तरह कलई खुल गई। समूचा विपक्ष इस कदर बिखरा हुआ दिखाई दिया कि मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस के लिये अब नये सिरे से सहयोगियों की तलाश की चुनौती आ गयी है। अगर विपक्ष की एकजुटता का भ्रम बरकरार रहता तो कायदे से प्रस्ताव के समर्थन में उन सभी 206 सांसदों को आगे आना चाहिये था जो ना तो केन्द्र की सरकार में साझीदार हैं और ना ही जमीनी स्तर पर भाजपा के समर्थक। साथ ही भाजपा के खाते में तो सिर्फ 295 वोट ही आना चाहिये था क्योंकि 18 सदस्योंवाली शिवसेना ने सरकार को समर्थन देने के बजाय मत-विभाजन का बायकाट करना ही उचित समझा और भाजपा के सांसद कीर्ति आजाद निजी कारणों से सदन ही नहीं आए। लेकिन शिवसेना द्वारा समर्थन दिये जाने से ठेंगा दिखा दिये जाने के बावजूद सरकार को अगर 325 वोट जुटाने में कामयाबी मिल गयी और बीजेडी व एनसीपी को विपक्ष से अलग करने में वह सफल रही तो इसे निश्चित ही सदन में सरकार की बड़ी जीत और मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस के लिये इसे शर्मनाक शिकस्त के तौर पर देखा जाना ही उचित होगा। इस मतविभाजन के नतीजों ने देश की पूरी राजनीतिक तस्वीर साफ कर दी है और अगले साल होने जा रहे आम चुनाव के लिये बनने वाले समीकरणों को भी सतह पर ला दिया है। अब यह पूरी तरह स्पष्ट हो गया है कि कांग्रेस को समूचे विपक्ष का नेतृत्व सौंपने को लेकर राष्ट्रीय स्तर पर कतई सहमति का माहौल नहीं पा रहा है। महाराष्ट्र की एनसीपी, तमिलनाडु की अन्ना द्रमुक, ओडिशा की बीजद, तेलंगाना की टीआरएस और आंध्र की टीडीपी सरीखी स्थानीय स्तर पर बेहद ताकतवर समझी जानेवाली उन पार्टियों का अब कांग्रेस के साथ मिल कर चुनाव लड़ना निहायत ही मुश्किल दिख रहा है। इसके अलावा कर्नाटक में भी शायद ही उस जदएस के साथ कांग्रेस का चुनाव तालमेल हो सके जिसके साथ मिलकर वह सूबे में साझेदारी की सरकार चला रही है। यानि कांग्रेस के लिये अब तमाम उम्मीदें या तो बिहार व यूपी जैसे उन राज्यों से बची हैं जहां महागठजोड़ की कोशिश फिलहाल कामयाब होती दिख रही है अथवा उसे अब मध्य प्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़, गुजरात व पंजाब सरीखे उस सूबों में अपने बलबूते पर ही कोई करिश्मा कर दिखाना होगा जहां उसकी भाजपा से सीधी टक्कर होने वाली है और तीसरी ताकत के लिये कोई जगह ही नहीं है। यानि संसद से सामने आयी सियासी तस्वीर को समग्रता में समझने की कोशिश करें तो अगले चुनाव में विपक्षी महागठजोड़ बनाकर गैर-भाजपाई वोटों का राष्ट्रीय स्तर पर बिखराव रोकने की तमाम कोशिशें नाकाम हो गयी हैं और यह साफ पता चल रहा है कि कुछ गिने-चुने सूबों को छोड़कर अधिकांश स्थानों पर बहुकोणीय मुकाबला ही होना है। 
     साथ ही भाजपा के मौजूदा प्रसार को देखें तो इस बार दक्षिण के राज्यों में भले ही भाजपा कोई बड़ी ताकत बनकर नहीं उभर पायी हो लेकिन शेष समूचे भारत में तकरीबन हर सीट पर मुकाबले की तस्वीर भाजपा बनाम अन्य की ही रहनेवाली है। यानि इस दफा राष्ट्रीय स्तर पर कांग्रेस की ओर से भाजपा को सीधी चुनौती भी नहीं मिलने जा रही है बल्कि जिन सीटों पर भाजपा का मुकाबला किसी गैर कांग्रेसी दल से होगा वहां कांग्रेस ही भाजपा को लाभ पहुंचाएगी क्योंकि ऐसी सीटों पर गैर-भाजपाई वोटों में ही कांग्रेस भी सेंध लगाएगी और इसके कारण सीधे तौर पर भाजपा को लाभ और उस तीसरे दल को नुकसान होगा जो अपनी अलग पहचान को मजबूती देने के लिये अपने दम पर चुनाव मैदान में उतरेगी। यानि संसद में हुए मत-विभाजन के बाद सबसे बेचारी तस्वीर कांग्रेस की ही उभरी है। उस पर कोढ़ में खाज की बात यह कि कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने सदन में झूठे व मनगढ़ंत तथ्यों के आधार पर आरोप लगाने, आंख मारने, महिला सांसद के लिये अमर्यादित शब्द का इस्तेमाल करने और प्रधानमंत्री के गले पड़ने जैसी हरकतें करके अपनी पप्पू वाली छवि को राष्ट्रीय ही नहीं बल्कि अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भी पुख्ता कर लिया है और फ्रांस के राष्ट्रपति का नाम लेकर झूठ बोलने के बाद उनकी विश्वसनीयता को गहरा आघात पहुंचा है। ऐसे में वाकई उन्हें शुभकामनाओं की ही जरूरत है ताकि कांग्रेस पर उनकी पकड़ बरकरार रहे और वे इस हैसियत में रहें कि वर्ष 2024 में एक बार फिर केन्द्र की सरकार के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव ला सकें। 

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