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लोकतंत्र और अनुशासन

बाल मुकुन्द ओझा

जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में अनुशासन आवश्यक है। यदि अनुशासन का पालन नहीं किया जाए तो जीवन उच्छृंखल बन जाएगा। हमारे देश की आज यही हालत है। ऐसा लगता है जैसे अनुशासन को हमने अपने शब्दकोष से ही निकाल दिया है। यही कारण है कि हर क्षेत्र में अनुशासनहीनता का बोलबाला बढ़ गया है। विधायिका, कार्यपालिका, न्यायपालिका को लोकतंत्र के तीन प्रमुख स्तंभ माना जाता है। इसमें चौथे स्तंभ के रूप में मीडिया को शामिल किया गया।  कहा जाता है कि  लोकतंत्र की सफलता  के लिए जरूरी है कि उसके ये चारों स्तंभ मजबूत हों। चारों अपना अपना काम पूरी जिम्मेदारी, ईमानदारी व निष्ठा से करें। मगर ये बातें अब कागजों तक सीमित होकर रह गई है। लोकतंत्र के इन स्तम्भों पर एक नजर डालें तो सर्वत्र अनुशासनहीनता ही देखने को मिलेगी। केंद्र और राज्य सरकारें सरेआम एक दूसरे को नीचा दिखाने पर तुली है। प्रधानमंत्री पद की मर्यादाओं को ताक पर रख दिया गया है। राजनीतिक पार्टियों और नेताओं का आचरण अनुशासन की सीमा को लाँघ रहा है। कार्यपालिका संवैधानिक व्यवस्थों को तार तार करने में जुटी है। दिल्ली का ज्वलंत उदहारण हमारे सामने है। न्यायपालिका को जनतंत्र का रखवाला माना जाता है मगर दूसरों को न्याय का आईना दिखाने वालों ने परस्पर आरोप प्रत्यारोपों की झड़ी लगाकर न्याय के मंदिर में अनुशासन की बलि चढ़ा दी। आखिर अनुशासन बचा कहाँ है।
 मानव जीवन की पहली सीढ़ी विद्याध्ययन की है जहाँ छात्र सबसे पहले अनुशासन का पाठ सीखता है। विद्या के इन मंदिरों में अनुशासनहीनता का खेल जमकर खेला जाता है।  शिक्षा के मंदिर से लोकतंत्र के मंदिर संसद तक अनुशासन स्वाहा हो रहा है। कहने का तात्पर्य है जीवन का ऐसा कोई क्षेत्र नहीं बचा है जहाँ अनुशासन सही सलामत हो।
आज विश्व में जितनी समस्याएं हैं उनका एक मात्र कारण है मनुष्य का अनुशासन हीन जीवन। अनुशासन का पाठ बचपन से परिवार में रहकर सीखा जाता है। विद्यालय जाकर अनुशासन की भावना का विकास होता है। अच्छी शिक्षा विद्यार्थी को अनुशासन का पालन करना सिखाती है।  स्वामी विवेकानंद  के अनुसार आदर्श, अनुशासन, मर्यादा, परिश्रम, ईमानदारी तथा उच्च मानवीय मूल्यों के बिना किसी का जीवन महान नहीं बन सकता है। अनुशासन, लक्ष्यों और उपलब्धि के बीच का सेतु है।
  बिना अनुशासन के जीवन अधूरा और असफल है। विद्यार्थी जीवन में इसकी आवश्यकता इसलिए सबसे अधिक है क्योंकि इस समय विकसित गुण-अवगुण ही आगे चलकर उसके भविष्य का निर्माण करते हैं । अनुशासन के महत्व को समझने वाले विद्यार्थी ही आगे चलकर डॉक्टर, इंजीनियर व ऊँचे पदों पर आसीन होते हैं । अनुशासन का अर्थ है शासन या नियंत्रण को मानना । आदर्श जीवन जीने के लिए  व्यवस्थाओं का अनुसरण करना ही अनुशासन है अपने को वश में रखना अनुशासन है, अर्थात नियमानुसार जीवन के प्रत्येक कार्य करना जीवन को अनुशासन में रखना है । अनुशासन से दैनिक जीवन में व्यवस्था आती है । मानवीय गुणों का विकास होता है । नियमित कार्य करने की क्षमता, प्रेरणा मिलती  होती है अनुशासन ही मनुष्य को एक अच्छा व्यक्ति व एक आदर्श नागरिक बनाता है। 
जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में अनुशासन का महत्व है। अनुशासन से धैर्य और समझदारी का विकास होता है। समय पर सही निर्णय लेने की क्षमता बढ़ती है। इससे कार्य क्षमता का विकास होता है तथा व्यक्ति में नेतृत्व की शक्ति जाग्रत होने लगती है अनुशासन स्वतंत्रता प्रदान करता है जो व्यक्ति अनुशासित रूप से जीते हैं उन्हें स्वत ही विद्या, ज्ञान एवं सफलता प्राप्त होती है। आइंस्टीन ने कहा दृ “ऐसा नहीं है कि मैं अधिक बुद्धिमान हूँ। मैं केवल समस्याओं का हल ढूंढने के विषय में और समय बिताता हूँ।” अनुशासन के लिए विश्वास भरी दृढ़ता की आवश्यकता है। आप को पसंद हो या ना हो उस की चिंता करे बिना यदि आप अपने चुने हुए मार्ग पर चलते रहें तो वह वास्तव में अनुशासन है। यदि आप सकारात्मक हो कर अपने मार्ग को पसंद करने की विधि जान लें तो अनुशासित रूप से जीना सहज हो जाता है। 

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