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स्तनपान जीवन की नींव है

स्तनपान के प्रति जागरूकता लाने के उद्देश्य से 170 से भी अधिक देशों में एक से सात अगस्त विश्व स्तनपान सप्ताह के रूप में मनाया जाता है। स्तनपान का उद्देश्य मां के दूध की अहमियत को समझने एवं बच्चे के स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता फैलाना है। विश्व स्तनपान सप्ताह की वर्ष 2018 की थीम स्तनपान जीवन की नींव है। थीम के मुख्य उद्देश्य- समुदाय को बेहतर पोषण, खाद्य सुरक्षा, स्तनपान के संबंध में जानकारी देना, स्तनपान जीवन का आधार है, बेहतर प्रभाविता हेतु संगठन एवं व्यक्ति की सहभागिता को प्रेरित करना, बेहतर पोषण हेतु खाद्य सुरक्षा, गरीबी उन्मूलन के लिए निरंतर स्तनपान है।
  मॉं का दूध बच्चों को बड़ी से बड़ी बीमारी से लड़ने में मदद करता है और उन्हें  कई प्रकार के रोगों से बचाता है।  नवजात शिशुओं के लिए माँ का दूध अमृत के समान है। माँ का दूध शिशुओं को कुपोषण व अतिसार जैसी बीमारियों से बचाता है। इससे शिशु मृत्युदर में भारी गिरावट लाई जा सकती है। डब्ल्यूएचओ ने सिफारिश की है कि माँ का पीला व गाढ़ा कोलोस्ट्रम वाला दूध नवजात शिशु के लिए सर्वोत्तम आहार है। विशेषज्ञों का मानना है कि जन्म के 1 घंटे के भीतर ही यदि शिशु को स्तनपान कराया जाए तो हजारों नवजातों को मरने से बचाया जा सकता है।  सामान्यता बच्चे को 6 महीने की अवस्था तक स्तनपान कराने की अनुशंसा की जाती है। शिशु को 6 महीने की अवस्था और 2 वर्ष अथवा उससे अधिक समय तक स्तनपान कराने के साथ-साथ पौष्टिक पूरक आहार भी देना चाहिए।  स्तन में दूध पैदा होना एक नैसर्गिक प्रक्रिया है जब तक बच्चा दूध पीता है तब तक स्तन में दूध पैदा होता है एवं बच्चे के दूध पीना छोड़ने के पश्चात कुछ समय बाद अपने आप ही स्तन से दूध बनना बंद हो जाता है। 
स्तनपान के व्यवहार को अपनाकर 5 वर्ष से कम आयु के बच्चों में होने वाली 13 प्रतिशत मृत्यु को बचाया जा सकता है। अधिक समय तक स्तनपान करने वाले बच्चों की बुद्धि उन बच्चों की अपेक्षा 3 प्वाईंट अधिक होती है जिन्हें मां का दूध थोड़े समय के लिए प्राप्त होता है। स्तनपान स्तन कैंसर से होने वाली मृत्यु को भी कम करता है। स्तनपान शिशु को अपने शरीर का तापमान सामान्य रखने में मदद करता है। उसे गर्माहट प्रदान करने के अलावा, त्वचा से त्वचा का स्पर्श आपके और शिशु के बीच के भावनात्मक बंधन को और मजबूत बनाता है। स्तनदूध शिशु की इनफेक्शन से लड़ने में मदद करता है। इसमे रोगप्रतिकारक होते हैं, जो शिशु की जठरान्त्रशोथ, सर्दी-जुकाम, छाती में इनफेक्शन और कान के संक्रमण आदि से रक्षा करते हैं। स्तनपान करवाने से बचपन में शिशु की सांस फूलने और गंभीर एग्जिमा विकसित होने का खतरा कम हो सकता है। 

पिछले वर्षों में कामकाजी माताओं की संख्या बढ़ने के साथ ही स्तनपान को नजरअंदाज किया जाने लगा और बॉटल से ऊपर के दूध को प्राथमिकता दी जाने लगी । भागदौड़ भरी जिंदगी में कामकाजी महिलाओं की संख्या बढ़ने से स्तनपान में गिरावट आयी है।  शिशुओं को ऊपरी दूध पिलाया जा रहा है जो बच्चों के लिए कभी-कभी घातक होता है।  इसका अंदाजा बढ़ रहे कुपोषित बच्चों की तादाद से लगाया जा सकता है।  बॉटल फीडिंग व ऊपर के दूध से जुड़े खतरों के बारे में लोग ज्यादा नहीं जानते। इन सभी बातों को लेकर जागरूकता बढ़ाने के लिए विश्व के विभिन्न देशों और वहां के विभिन्न समुदायों और तबकों में स्तनपान को बढ़ावा देने के लिए प्रयास किए जाते हैं। मां के दूध में सभी पोषक तत्व बिलकुल सही अनुपात में होते हैं, इसका कोई विकल्प हो ही नहीं सकता।
संयुक्त राष्ट्र बाल कोष ने विभिन्न देशों में स्तनपान के आंकड़े जारी किए हैं। आंकड़ो के अनुसार दुनिया के 8.20 लाख बच्चे ऐसे हैं, जिन्हें मां का दूध नहीं मिल पाता, जिससे वे मौत के शिकार हो जाते हैं। वहीं 76 लाख बच्चे बिना मां का दूध पीए ही बड़े हो रहे हैं। यहां हर साल लाखों बच्चों की मौत स्तनपान न करने से हो जाती है, वहीं कुछ बच्चे कुपोषण के शिकार हो जाते हैं।  कुछ देश ऐसे हैं, जहां पर महिलाएं अपने बच्चे को बहुत ज्यादा स्तनपान कराती हैं। इस सूची में श्रीलंका सबसे आगे है। इस देश में 99.4 फीसदी बच्चों को मां का दूध मिलता है। यहां स्तनपान की दर 55 फीसदी है। भूटान दूसरे नंबर पर है। यहां 99.3 फीसदी बच्चे मां का दूध पीते हैं। इसके बाद तीसरे नंबर पर नेपाल है, यहां 99.1 फीसदी बच्चों को मां का दूध अच्छे से नसीब होता है। दुनिया में ऐसे तीन देश भी हैं, जहां स्तनपान की दर सबसे कम है। इनमें पहले स्थान में आयरलैंड , दूसरे नंबर पर फ्रांस है और  तीसरे नंबर पर अमेरिका है। स्तनपान के मामले में भारत की स्थिति बेहतर है। यहां स्तनपान की दर 95.5 फीसदी है। हालांकि अब सरकार का लक्षय इस दर को पूरा 100 फीसदी करने का है।
- बाल मुकुन्द ओझा
वरिष्ठ लेखक एवं पत्रकार

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