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पुरातात्विक स्थलों के संरक्षण में जनभागीदारी का सवाल

इन दिनों देश की पुरातत्विक धरोहरों को बचाने के लिए जिस जनभागीदारी की वकालत की जा रही है, वह दूसरे देशों में बहुत पहले से अस्तित्व में है। दरअसल, वहां के वरिष्ठ नागरिक बजाप्ता क्लब बनाकर न केवल पर्यटकों को गाइड करते हैं, बल्कि उन्हें बचाने, सहेजने और संवारने में भी मदद करते हैं। इसलिए भारतवासी भी ऐसा कर सकते हैं।
इस बात में कोई दो राय नहीं कि भारतवर्ष की हजारों साल की जो गाथाएं हैं, वह दुनिया के लिए किसी अजूबा से कम नहीं। लिहाजा, जब हमलोग उसे विश्व के सामने गर्व से प्रस्तुत करेंगे तो हमारा पर्यटन क्षेत्र ऊंची उड़ान भरने लगेगा। ऐसा इसलिए कि पुरातात्विक धरोहरों के समुचित संरक्षण और संवर्द्धन के द्वारा अंतरराष्ट्रीय और देशी पर्यटकों को लुभाया जा सकता है। लेकिन अहम सवाल यह है कि विगत सात दशकों में किसी भी सरकार अथवा निजी कंपनियों ने इस दिशा में ध्यान क्यों नहीं दिया, या फिर अपेक्षा से बहुत कम दिया, यह सोचने वाली बात है।
सम्भव है कि सरकार की तब की नीति और अब की नीति में एक बहुत बड़ा तफरका आ गया होगा, क्योंकि हमारा 'समाजवादी गणतंत्र' धीरे-धीरे 'पूंजीवादी गणतंत्र' की ओर शिफ्ट हो रहा है। स्वाभाविक है कि तब निजी क्षेत्र को प्रोत्साहित
करने वाली नीति नहीं रही होगी, लेकिन लगभग ढाई दशक पहले देश में नई आर्थिक नीतियों के लागू होने के बाद अब तो निजी कम्पनीज के लिए दरवाजे खुले ही चुके हैं। फिर भी भूमण्डलीकरण और उदारीकरण के तीसरे दशक में भी यदि हमलोग योजना ही बनाएंगे तो बेहतर परिणाम कब मिलेगा समझा जा सकता है। 

यूं तो मोदी सरकार कारपोरेट दुनिया को स्वाभाविक साझेदार के रूप में देखती है, लेकिन स्थानीय कम्पनियां इसमें कितनी अभिरुचि लेंगी, समझना कठिन नहीं है। पहले भी चर्चित और कमाऊ पुरातात्विक धरोहरों के संरक्षण-संवर्द्धन में नामचीन कम्पनीज अपनी दिलचस्पी दिखा चुकी हैं, लेकिन कम लोकप्रिय और उपेक्षित धरोहरों के संरक्षण-संवर्द्धन के लिए भारतवासियों को ही आगे आना होगा, वो भी बिना कोई गिला-शिकवा किए।

इस बात में कोई दो राय नहीं कि पुरातात्विक धरोहरों के संरक्षण के लिए जनभागीदारी महत्वपूर्ण है। इसके लिए हमें अपनी विरासत के बारे में न केवल अद्यतन जानकारी रखनी होगी बल्कि उस पर हमें गर्व भी करना पड़ेगा। ऐसा इसलिए कि हमारे इतिहास, उनकी सभ्यता-संस्कृति और कतिपय देशज-विदेशज लोक परम्पराओं से उनका गहरा नाता होता है। बस इसे समझने और समझकर उन्हें सहेजने की जरूरत है, इस बात का ध्यान रखते हुए कि किसी को आर्थिक क्षति नहीं हो।
शायद इसलिए दुनिया के कुछ देशों में लोग धरोहरों के संरक्षण में अपना अहम योगदान देते हैं और हमें भी देना चाहिए, लेकिन अफसोस की बात है कि हमारे देश में यह सोच विकसित नहीं हुई है। सवाल है कि इसे विकसित करेगा कौन? वह सरकार जो कि खुद को धर्मनिरपेक्ष घोषित करते हुए कतिपय पुरातात्विक धरोहरों को भी साम्प्रदायिक नजरिए से प्रोत्साहित या हतोत्साहित करती है। मैं कोई उलाहना नहीं दे रहा बल्कि जज्बाती इतिहास और अपने शासकों की अबतक की मनोवृत्ति की ओर इशारा कर रहा हूं ताकि हालात सुधरे।
इस बदलते नजरिए से यदि हमलोग युवाओं को पर्यटन गाइड के तौर पर प्रशिक्षित करते हैं तो न केवल रोजगार सृजन में मदद मिलेगी बल्कि पुरातात्विक स्थलों के प्रति भी लोगों में समरूप अभिरुचि पैदा होगी। इसके अलावे, यदि बच्चों को उनके पाठ्यक्रम में उनके शहर का इतिहास प्रोजेक्ट वर्क अथवा प्रायोगिक परीक्षा के माध्यम से बताया जाएगा तो छात्रों में भी स्थानीय इतिहास चेतना का विकास होगा, जिससे इन पुरातात्विक धरोहरों के संरक्षण और संवर्द्धन के प्रति वे हमेशा सजग रहेंगे। 
यदि स्थानीय सरकारी/निजी कम्पनीज के कर्मचारियों से बातचीत करके प्रति माह उनके दस-पन्द्रह घण्टे भी इस दिशा में लिए जाएं तो यह एक सार्थक पहल होगी जिससे उसके प्रति सामूहिक चेतना का विस्तार होगा। 
इसमें कोई शक नहीं कि पुरातत्वविद भी अपनी विधा में वैज्ञानिक दृष्टि रखते हैं और विज्ञान की तरह ही वह भी बदलाव के वाहक होते हैं। जिस तरह से वह सालों साल किसी जंगल, पहाड़ या मैदान में चुपचाप अपना काम करते रहते हैं, उसका परिणाम दुनिया के सामने तब आ पाता है जब लोगों से वह कोई नई महत्वपूर्ण जानकारी साझा करते हैं।
मेरी राय में इस हेतु सिर्फ कारपोरेट दुनिया पर निर्भर रहने की बजाय यदि हमलोग स्थानीय एनजीओज, ट्रस्ट आदि को भी प्रोत्साहित करेंगे और मॉनिटरिंग करते रहेंगे तो बेहतर परिणाम मिल सकते हैं। यही नहीं, इनके वित्त पोषण और मॉनिटरिंग की जिम्मेवारी यदि त्रिस्तरीय पंचायती राज संस्थाओं, यथा- ग्राम पंचायत, पंचायत समिति, जिला परिषद, नगर पंचायत, नगर परिषद, नगर पालिका और नगर निगमों के प्रधान को क्षेत्रवार पदेन और सामूहिक रूप से सौंप दिया जाएगा तो सकारात्मक बदलाव आ सकता है।
बेशक, यदि ऐसा किया जाएगा तो जनभागीदारी स्वतः सुनिश्चित होती जाएगी। इसके अलावा, स्थानीय विधायकों-सांसदों की भागीदारी को सुनिश्चित करने के लिए भी इन सबकी सदस्यता वाली एक सामूहिक विकास समिति बने, जिसके माध्यम से पुरातात्विक स्थलों के संरक्षण-संवर्द्धन की न केवल कोशिश हो बल्कि आय-व्यय हेतु पर्याप्त वित्तीय प्रबन्ध भी किए जाएं। इससे न केवल पर्यटन और उससे जुड़े कामधन्धों का विकास होगा, बल्कि सबकी आय में भी आशातीत इजाफा सम्भव है।
लेकिन, अहम सवाल यह है कि जिन धरोहर स्थलों पर आम नागरिकों के लिए फोटोग्राफी तक की मनाही है, उसके संरक्षण के लिए जनभागीदारी सुनिश्चित करने हेतु सरकार क्या-क्या सहूलियतें देगी और क्या-क्या अड़ंगे लगाएगी, देखना-सुनना-समझना और सबसे बढ़कर इंतजार करना दिलचस्प रहेगा। हालांकि उम्मीद है कि जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के मुखारबिंद से ऐसी बातें निकली हैं तो वह बहुत दूर तक जाएगी, कभी कभार जकड़बन्द फाइलों से तो यदाकदा उनकी दीवारों से वह तबतक टकराएगी जब तक कि उसके राष्ट्रीय उद्देश्य पूरे न हो जाएं।
                                                                                                     कमलेश पांडे, वरिष्ठ पत्रकार व स्तम्भकार

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